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प्रदूषणमुक्त गंगा की घोषणा स्वागत योग्य

नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी की बैठक में 2020 तक गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की घोषणा स्वागत योग्य है। उम्मीद है कि यह घोषणा हवाई साबित नहीं होगी। गंगा नदी के साथ हमारी सभ्यता और संस्कृति का अस्तित्व भी जुड़ा हुआ है। इतिहास गवाह है कि नदियों के विलुप्त होने से बड़ी-बड़ी सभ्यताएं खत्म हो गईं। जैसे दिल्ली में यमुना गंदे नाले में तब्दील हो गई है, कहीं वैसा ही हाल जीवनदायी गंगा का  न हो जाये। इसके लिए उच्च स्तरीय प्रयास की जरूरत है।
रविदत्त सेमवाल, बौराड़ी, नई टिहरी

सराहनीय प्रयास
यह गौरव की बात है कि शिक्षा विभाग द्वारा ऐसे शिक्षकों की खोज की जा रही है, जिनमें रचना धर्मिता व सृजनशीलता हो। विभिन्न स्तरों पर शिक्षक का बौनापन समाज के सामने परोसा जाता है। परिणाम स्वरूप शिक्षक की छवि पर धब्बा सा लग गया है। हालांकि विभाग में अध्ययनशील, सरल स्वभाव, विनम्र, जिज्ञासु शिक्षक बड़ी संख्या में हैं। लेकिन उनको नजर अंदाज किया गया, उन्होंने जो कुछ लिखा, उसे मैकाले की तरह रद्दी समझा। घिनौनी राजनीति ने योग्य शिक्षकों को कुंठा का शिकार बना दिया। देर से ही सही, ऐसे शिक्षकों की जरूर पूछ होगी, जो अपने लेखों, पोस्टरों, कला के माध्यम से समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं। योग्य और कुशल शिक्षकों को प्रोत्साहित करने की योजना स्वागत योग्य कदम है। मेरा अन्य विभाग के अधिकारियों से निवेदन है कि वे अपने विभाग में भी रचनाकारों की खोजबीन करें, ताकि प्रतिभा सबके सामने आए।
कालिका प्रसाद सेमावाल, रुद्रप्रयाग

भारतीय मूल को बदलना होगा
भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक को रसायन का नोबेल पुरस्कार दिया जाना है। आज से पहले न जाने किन-किन क्षेत्रों में हमें नोबेल पुरस्कार मिल चुके होते। रामकृष्णन की तरह ही अन्य कई वैज्ञानिक, साहित्यकार और डाक्टरों को भारतीय मूल के अमेरिकी, कनाडा या आस्ट्रेलिया जैसे कई नामों पर हम फख्र करते हैं। दुख इस बात का है कि हम भारतीयों को नोबेल पुरस्कार मिला, ऐसा नहीं कह सकते हैं। हमें भारतीय मूल को भारतीय में बदलना होगा। भारत से  हमेशा उस प्रतिभा का पलायन होता रहा है, जो आगे चलकर भारतीय मूल का होकर नोबेल पुरस्कार हासिल करता है। इसे रोकने के प्रयास करने होंगे।
प्रदीप सिंह, श्रीनगर गढ़वाल

ये कैसा सम्मान
जहाँ भारत में लोग क्रिकेट खिलाड़ियों की झलक पाने को लालायित रहते हैं, वहीं दूसरी ओर पीटी उषा जैसी खिलाड़ी को नजर अंदाज करना हमारी राष्ट्रीय गरिमा को उपेक्षित नजरों से देखने जैसा होगा। एक ओर सरकार खेलों के विकास और प्रतिभाओं के सम्मान के लिए करोड़ों खर्च करती है, वहीं सरकार के नुमाइंदे ऐसे खिलाड़ी (प्रतिभा) को उपेक्षित करते हैं जिसने ओलंपिक में पदक प्राप्त कर भारत का सिर गर्व से ऊंचा किया। जनता को खेल के मायने इतने संकुचित हो चुके हैं कि वह क्रिकेट को ही खेल समझती है। यदि ऐसी घटना सचिन तेंदुलकर या धोनी के साथ होती तो हंगामा हो जाता। दोषी लोगों को सजा मिल जाती। हमें सोचने का दायरा विकसित करना होगा और खेल को मात्र मनोरंजन के रूप में न लेकर इसके स्वरूप को वृहद मायने देने होंगे ।
यतीन्द्र कुमार, देव सं.विवि, हरिद्वार

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