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चांद वाले पानी की इतनी प्यास क्यों

भारत के चंद्रयान ने पिछले दिनों चंद्रमा की सतह पर पानी के चिह्न् दर्शाने वाले चित्र भेजकर सारी दुनिया को ताज्जुब में डाल दिया था। इसके बाद अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन नासा ने इससे आगे जाकर पक्के सबूत की तलाश में शुक्रवार को अपने अंतरिक्ष यान की चांद की सतह से  टक्कर करा दी। अब अमेरिका के अंतरिक्ष वैज्ञानिक इस टक्कर के निष्कर्षो की खोज में मशगूल हैं और जल्दी ही ये ऐलान करेंगे कि चांद पर पानी की क्या स्थिति है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं अनुराग मिश्र

अभियान और लक्ष्य
-   एलसीआरओएसएस को 18 जून, 2009 को इंपेक्टर स्पेसक्राफ्ट छोड़ा गया। यह चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की खोज करेगा।
-  28 सितंबर, 2009 को यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल एयरोनॉटिक्स और स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ने कैबियस का इंपेक्ट टारगेट के रूप में चयन किया।
-  कैबियस एक लूनर क्रेटर है जो कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव से 100 किमी. दूर है। ये क्रेटर एक गड्ढेनुमा है। चांद के इस हिस्से में हमेशा अंधेरा छाया रहता है। वैज्ञानिकों को चांद के इस इलाके में ही पानी की मौजूदगी की सबसे ज्यादा संभावना है।
-  ल्यूनर क्रेटर ऑब्जरवेशन एंड सेंसिग सेटेलाइट (एलसीआरओएसएस) नासा द्वारा ऑपरेटेड रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट है जिसको 18 जून, 2009 को ल्यूनर रीकनेसां ऑर्बिटर (एलआरओ) में लांच किया गया था।
-  दस वर्षो में चांद पर अमेरिका का ये पहला बड़ा मिशन है।
-  एलसीआरओएसएस को सेंटोर की ऊपरी सतह पर नजर रखने के लिहाज से डिजाइन किया गया है। जिसका इंपेक्ट मास 2305 किग्रा है। एलसीआरओएसएस में 22 अगस्त को खराबी आ गई थी। इसमें मौजूद आधा ईंधन खाली हो गया था।


लूनर क्रेटर ऑब्जरवेशन एंड सेंसिग सेटेलाइट (एलसीआरओएसएस)
नासा द्वारा ऑपरेटेड रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट है जिसको 18 जून, 2009 को ल्यूनर रीकनेसां ऑर्बिटर (एलआरओ) में लांच किया गया था। दस वर्षो में चांद पर अमेरिका का ये पहला बड़ा मिशन है।
मिशन
-  79 मिलियन डॉलर (तकरीबन 367 करोड़ रुपए) का मिशन
-  स्पेसक्राफ्ट के दो कंपोनेंट सैंटूर और एलसीआरओएसएस  चांद की सतह पर गोली की रफ्तार से दुगनी गति से एप्रोच करेंगे। ऊपरी सतह सेंटूर, पहले लैंडिंग करेगी और निशान बनाएगी। चार मिनट के बाद एलसीआरओएसएस चांद पर क्रैश करेगी।
-  क्राफ्ट में मुख्यत: दो पार्ट होते हैं- सैंटूर अपर स्टेज रॉकेट और एक छोटा स्फीयर हेडिंग स्पेसक्राफ्ट

कार्य
891 किग्रा एलसीआरओएसएस  के ऊपर स्थापित कैमरे ने धूल उड़ती हुई शुरुआती इंपैक्ट की तस्वीरें भेजीं, और स्वयं चांद पर उतरने से पूर्व डाटा एकत्र कर पृथ्वी पर भेजा। इंपैक्ट होने पर 1.5 टीएनटी टन के बराबर ऊर्जा जनित हुई।

कैबियस क्रेटर
कैबियस एक ल्यूनर क्रेटर है जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव से 100 कि.मी. दूर है। ये क्रेटर एक गड्ढेनुमा है। चांद के इस हिस्से में हमेशा अंधेरा छाया रहता है। वैज्ञानिकों को चांद के इस इलाके में ही पानी की मौजूदगी की सबसे ज्यादा संभावना है। नासा ने ‘चंद्रयान-प्रथम’से मिली जानकारी के आधार इस हिस्से को टारगेट किया था। इस क्रेटर को कैबियस नाम दिया गया था। क्रेटर को चित्र में दर्शाया गया है। इसी हिस्से में जाकर रॉकेट टकराया था जिसके बाद धूल का गुबार उड़ा। नीचे चित्र में इसे दिखाया गया है।

मून मिनरोलॉजी पेपर (एम-3)
एम-3 ने चंद्रसतह के 97 फीसदी हिस्से की मैपिंग की है। इसके भेजे आंकड़ों में परावर्तित प्रकाश की तरंगधैंर्य देखी गई जिसके विश्लेषण से साफ होता है कि चंद्रसतह की ऊपरी मिट्टी की पतली परत में मौजूद सामग्री में हाइड्रोजन और आक्सीजन के बीच रासायनिक संबंध हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह विश्लेषण बताता है कि मिट्टी की ऊपरी सतह में नमी थी

इपोक्सी मिशन
डीप इंपेक्ट प्रोब से मिले आंकड़े भी इन तथ्यों का समर्थन करते हैं। ध्रुवों पर पानी की संभावना सबसे ज्यादा है

केसानी एयरक्राफ्ट
1999 में वाटर और हाइड्रोक्सिल मॉलीक्यूल होने की बात सामने आई।

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