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अब चाँद की माँद से खुलेंगे कई रहस्य

अंतरिक्ष में जीवन की संभावनाओं की अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित करने के प्रयास में जुटे नासा ने चांद के पर्यावरण के विषय में गहन जानकारी जुटाने के लिए ल्यूनर रीकनेसां ऑर्बिटर (एलआरओ) को सफलतापूर्वक लांच किया है। 23 जून को एलआरओ चांद पर पहुंच गया था। मानवरहित एलआरओ अंतरिक्ष यान, चांद की कक्षा के चारों और चक्कर लगाते हुए चांद की विशेषताओं व संसाधनों के बारे में सूक्ष्म जानकारियों को जुटाएगा और इसका विस्तृत नक्शा तैयार करेगा। एलआरओ का मुख्य फोकस चांद की सतह पर संभावित सुरक्षित लैंडिंग साइट्स का चयन करना, चांद पर मौजूद संसाधनों की पहचान करना तथा किस तरह चांद की किरणें मानव शरीर को प्रभावित करती है आदि के अवलोकन पर रहेगा।

चांद के पर्यावरण को और अधिक समझने की कोशिशों में चांद की ओर बढ़ रहा एक अन्य अंतरिक्ष यान ल्यूनर क्रेटर ऑब्जर्वेशन ऐंड सेंसिंग सेटेलाइट (एलसीआरओएसएस) है। एलसीआरओएसएस कुछ ही माह में चांद के दक्षिणी ध्रुव के शैकल्टन क्रेटर में प्रवेश करते हुए ऐसी सामग्री एकत्रित करेगा, जिन पर पिछले दो अरब सालों से रोशनी नहीं पड़ सकी है। इसके अलावा इसका उद्देश्य चांद पर पानी की मौजूदगी को बताने वाले तत्वों को खोजना भी है।

कुल मिलाकर ये सभी प्रयास चांद के बारे में अधिक से अधिक समझ विकसित करने से जुड़े हुए हैं। नासा की कोशिश चांद की सतह पर पानी की मौजूदगी की खोज करके 2020 तक अमेरिकी अंतरिक्षयात्रियों के चांद पर योजनाबद्ध आवागमन को संभव बनाना है। शुक्रवार 9 अक्तूबर को पानी की तलाश में नासा ने सतह पर अपने अंतरिक्ष यान की टक्कर करा दी। धमाके के बाद चांद की सतह से जो टुकड़े उड़े हैं उससे यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि उसमें जलवाष्प के लक्षण तो नहीं है।

भारतीय समयानुसार शाम चार-पांच बजे करीब नौ हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव स्थित क्रेबर क्रेटर की सतह से जा टकराया। इससे 20 मीटर चौड़ा, 4 मीटर गहरा गड्ढा हुआ। इसके चार मिनट बाद कैमरों से लैस एक और यान ने उसके असर को रिकॉर्ड किया। धमाके के बाद चांद की सतह पर रोशनी हो गई। विस्फोट से चट्टानें टूट गई। इस भीषण टक्कर के बाद आसमान में धूल का गुबार फैल गया। गौर करने वाली बात है कि रॉकेट चांद के जिस हिस्से से टकराया है उसे ‘चंद्रयान-प्रथम’ से मिली जानकारी के आधार पर चुना गया था। चांद के दक्षिणी ध्रुव के इस इलाके को कैबियस कहते हैं। ये एक ‘क्रेटर’ यानी बड़े गड्ढेनुमा है।

चांद के इस हिस्से में हमेशा अंधेरा छाया रहता है क्योंकि यहां करोड़ों साल से सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है। वैज्ञानिकों का मानना है कि चांद के इस इलाके में ही पानी की मौजूदगी की सबसे ज्यादा संभावना है क्योंकि वहां मौजूद पानी सूरज की गर्मी से वाष्पित नहीं हुआ होगा। नासा के वैज्ञानिकों ने यह पहले ही साफ कर दिया है कि इससे चांद या अंतरिक्ष को किसी भी तरह का खतरा होगा। नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक यह जिस रफ्तार से टकराया है उससे कहीं ज्यादा रफ्तार से उल्का पिंड चांद से टकराते रहते हैं, लेकिन उससे चांद को कोई नुकसान नहीं होता।

द जाइंट इंपेक्ट थ्योरी
वैज्ञानिकों की अवधारणा के अनुसार चांद की उत्पत्ति एक बड़ी टक्कर का परिणाम थी, जिसे जाइंट इंपैक्ट अथवा बिग व्हैक कहते हैं। परिकल्पना के अनुसार सूर्य और सौरमंडल की उत्पत्ति के कुछ समय बाद लगभग 4.53 अरब वर्ष पहले मंगलग्रह के समान किसी बड़े आकार की चीज (जिसे कई बार थिया कहा जाता है) की पृथ्वी से टक्कर हुई। इसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर पृथ्वी के कणों व अन्य चीजों के मिश्रण का एक वाष्पीकृत बादल उत्पन्न हुआ जो कि पृथ्वी की कक्षा में चला गया। यह बादल ठंडा होने पर संघनित होकर ठोस छोटे गोल घेरे या रिंग में बदल गया, बाद में इसके एक साथ इकट्ठे होने पर चांद का निर्माण हुआ।

पोकमार्क्ड इतिहास
चांद पर मौजूद गड्ढे इसके इतिहास की जानकारी देते हैं। तकरीबन यहां पर कोई वातावरण नहीं है और चांद के अंदर लगातार छोटी-मोटी गतिविधियां होती रहती हैं। चंद्रमा के गड्ढों को देखने के बाद वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि लगभग 4 अरब वर्ष पहले यहां पर भारी उल्का वर्षा हुई। वर्तमान सोच के अनुरूप ऐसा माना जा रहा है कि यहां पर जीवन की संभावना मौजूद हो सकती है।

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