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रघुकुल रीत सदा चली आई

भाई के आगे सत्ता को ठोकर मारने और भाई के शरणागत होने की भरत की निष्ठा का समर्पण देखकर भगवान श्रीराम ने भी भरत को गले लगा लिया और भरत के आग्रह पर अपनी चरण पादुका उन्हें दी। भरत ने इस चरण पादुका को अयोध्या की गद्दी पर रखकर राम के प्रतिनिधि के रूप में तब तक अयोध्या का राजकाज चलाने का संकल्प लिया, जब तक राम वनवास से लौटकर नहीं आते।

रुद्रेश्वर रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित रामलीला के छठे दिन की लीला में भरत मिलाप दिखाया गया। राम के वनवास की सूचना भरत और शत्रुघन को तब मिली जब वे ननिहाल से लौटकर अयोध्या आए। अपनी मां कैकेई से भरत बहुत क्रोधित हुए। भरत और कैकेई के बीच का संवाद तथा भरत द्वारा भाई और भाभी सीता तथा अनुज लक्ष्मण के वन गमन से भरत बहुत दुखी होते हैं।

इस मार्मिक दृश्य को देखकर दर्शकों में भाई के प्रति श्रद्धा और समर्पण देखकर लोगों की आंखें छलछला गईं। इसके बाद शत्रु समेत भरत चित्रकूट में राम, लक्ष्मण, सीता से मिलने आते हैं और अयोध्या वापस लौटने का आग्रह करते हैं परंतु बचनबद्ध राम अयोध्या लौटने से इंकार कर देते हैं और भरत के गद्दी के त्याग और भ्रातृ प्रेम से गदगद होकर उन्हें गले लगाते हैं।

भरत राम की पादुका लेकर अयोध्या लौटते हैं और उनके प्रतिनिधि के रूप में राजकाज चलाने का संकल्प लेते हैं। पूर्व विधायक अनसूया प्रसाद मैखुरी ने कहा कि राम ने जीवन भर कष्ट सहा पर जिसने राम नाम भजा उसका कष्ट हमेशा दूर हुआ है।

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