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क्यों वहां नोबेल हो जाते हैं यहां के हिन्दुस्तानी

कुछ अभाव जितने पुराने पड़ते जाते हैं, उनकी टीसें उतनी ही गहरी और लाइलाज होती जाती हैं। बराक ओबामा और वेंकटरमन रामकृष्णन को नोबेल पुरस्कार ने भी हम हिन्दुस्तानियों के कई जख्म हरे कर दिए हैं। ओबामा क्यों गांधी से महानतर हैं? वेंकटरमन यानी वेंकी अगर भारत में बने रहते तो क्या उन्हें सर्वोच्च सम्मान हासिल होता? इस सवाल का जवाब पाने के लिए अतीत के अंधकार में गहरे उतरना होगा। जब हरगोविंद खुराना को नोबल पुरस्कार मिला, मैं छोटा था। पूरे देश में गर्व और उन्माद का भाव व्याप गया था। तब कुछ लोगों ने सवाल उठाया था कि क्या खुराना भारतीय हैं? वे तो अमेरिका में जा बसे हैं। तभी मेरे अबोध मन में भावुक सपना जन्मा था कि एक दिन हिन्दुस्तान में रहने वाले हिन्दुस्तानियों को भी नोबेल मिलेगा।

बरसों हो गए। यह सपना अभी तक जस का तस है। आज हम हिन्दुस्तानी इस बात पर तो गर्व कर सकते हैं कि हमारे मूल के लोग चाहे कारोबार हो या पत्रकारिता, विज्ञान हो या चिकित्सा, हर तरफ नाम कमा रहे हैं। पर हम इस सवाल को विस्मृत कर जाते हैं कि हिन्दुस्तान में रहने वाले हिन्दुस्तानी शीर्ष पर क्यों नहीं पहुंचते? फिर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ज्यादातर चमकदार चेहरे अमेरिका में रहते हैं। अमेरिका वह देश है, जहाँ प्रतिभा के अनंत सौदागर हैं। जो भी, जहाँ भी दिमाग वाला हो, उसे वे ललचाना जानते हैं। पिछले दो सौ साल में इस देश में लोकतंत्र के जरिए तरक्की के इतने रास्ते खुले हैं कि वहाँ जाकर बस जाना लोगों का ख्वाब बन गया है।

हम याद कर सकते हैं जर्मनी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन को। वे अपनी जन्मभूमि जर्मनी छोड़कर अमेरिका जा बसे थे। आज का रूस अमेरिका का पिछलग्गू लगता है। परन्तु 1991 से पहले इसका रुतबा अलग होता था। वे सोवियत संघ के दिन थे। सारी दुनिया अनोखी सैद्धांतिक लड़ाई में उलङी हुई थी। लोग उसे पूंजीवाद बनाम साम्यवाद के नाम से जानते थे। तनातनी के उन बेहद कटु दिनों में भी ऐसे प्रतिभाशाली लोगों की कमी नहीं थी, जो चोरी-छिपे पूर्वी यूरोप की सीमाएं लांघ कर अमेरिका जा बसे थे।

इस महादेश के समर्थक जहाँ इसे धरती का स्वर्ग कहते हैं, वहीं विरोधी उसे समूची कायनात का संसाधन चूसने वाला शैतान बताते हैं। अगर यह आँकड़ा सच है, तो चौंकाता है कि वहाँ दुनिया की कुल दो प्रतिशत आबादी रहती है। पर संसार के कुल खाद्य पदार्थो का 25 प्रतिशत वहाँ के लोग चट कर जाते हैं। अमेरिका का हाजमा सिर्फ खाने के मामले में नहीं, बल्कि प्रतिभाओं को  पचा लेने के मामले में भी दुरुस्त है। वेंकी और ओबामा भी इसकी एक मिसाल हैं। दोनों का मूल अमेरिका नहीं हैं।

जिस तरह ओलंपिक भारत को निराश करता रहा है, उसी तरह नोबेल भी अक्सर हताशा का प्रतीक बनता है। कुछ लोग आरोप लगाते रहे हैं कि भारत के साथ इस सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार का फैसला करने वाली कमेटी न्याय नहीं करती। महात्मा गाँधी का नाम अक्सर इस सिलसिले में लिया जाता है। मैं खुद भी मानता हूँ कि गाँधी के साथ इस समिति ने पूरा न्याय नहीं किया। जिन तकनीकी कारणों से उन्हें इस पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया था, वे निहायत बेतुके थे।

अब जब नोबेल शांति पुरस्कार पाने वालों की सूची देखता हूँ तो आश्चर्य होता है कि उनमें से कोई भी गाँधी के पाये के नहीं है। ओबामा इसका ताजा उदाहरण हैं। हमें भूलना नहीं चाहिए। मोहनदास करमचंद गाँधी ने जिस समय भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने की सोची थी, तब मीडिया आज जैसा नहीं था। आज बान की मून से कोई मिलना चाहता है तो अंतरराष्ट्रीय खबर बन जाती है। दलाई लामा के प्रति समूची श्रद्धा के साथ कहना चाहूंगा कि यदि वे गाँधी के समकालीन होते तो क्या यह दुनिया उन्हें इस दृष्टि से देखती?

मीडिया ने बहुत से दरवाजों को तोड़ दिया है और दीवारें गिरा दी हैं। तिएन आन मन चौक की घटना को चीनियों ने छुपाए रखा था। तब तक फैक्स ईजाद हो चुका था। किसी ने इसके जरिए ब्यौरा हांगकांग भेजा और वहाँ से पूरी दुनिया जान गई। चीन की कितनी फजीहत हुई? सिक्यांग में पिछले दिनों चीनी सेना अपने वह हथियार नहीं आजमा सकी, जो कभी उसने बीजिंग के चौराहे पर इस्तेमाल किये थे। वे जानते थे कि पूरी दुनिया की नजरें उन पर लगी हुई हैं। जरा भी ज्यादती की तो देश के ही अंदर दूसरा तिब्बत उठ खड़ा होगा। पर गाँधी के समय में ऐसा नहीं था। बिना किसी संचार साधन के उस साम्राज्य से जूझना, जिसकी हुकूमत में सूरज कभी डूबता नहीं था, आसान नहीं था। पर नोबेल देने वालों ने उन्हें इस लायक नहीं समझा। यह बात अलग है कि गाँधी का काम किसी पुरस्कार का मोहताज नहीं था। उन्हें याद करती पीढ़ियाँ इसका प्रमाण हैं।

फिर से साइंस और टेक्नोलॉजी पर आते हैं। किसी और को कोसने से पहले हमें खुद के भीतर झाँकना होगा। पूर्व राष्ट्रपति कलाम रह-रहकर अफसोस जताते रहे हैं कि हमारे बच्चे विज्ञान नहीं पढ़ रहे। उन्हें लगता है कि इससे उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी। यह अफसोसजनक है कि लॉर्ड मैकाले ने हिन्दुस्तानियों को बाबू बनाने के लिए जिस शिक्षा पद्धति की नींव रखी थी, वह आज भी जारी है। नई नस्ल आ गई पर रवायतें अभी भी पुरानी चली आ रही हैं। विज्ञान के प्रति नई पीढ़ी की रुचि को जागृत करना सिर्फ सरकार का नहीं, समाज का भी काम है। आखिर आर्यभट्ट, चरक, सुश्रुत या वाराहमिहिर कोई राजा या राष्ट्रपति नहीं थे। वे इसी समाज से उपजे थे। इसी समाज का हिस्सा थे और इसी समाज के लिए अजर-अमर हो गए।

हम जब तक सिर्फ नौकरी के लिए पढ़ते या पढ़ाते रहेंगे, तब तक समाज या देश दुलकी चाल नहीं चल सकेगा। हमें अपने बीच शिक्षकों, कलाकारों, साहित्यकारों और रचनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेने वालों का सम्मान करना सीखना होगा। क्या वजह है कि लंदन में रह रहे विक्रम सेठ देश के बारे में तब लिख पाते हैं, जब उन्हें वहाँ का समाज सुख-साधन उपलब्ध कराता है। क्या कारण है कि राजस्थान से गया कोई लोक कलाकार जब मुंबई के गेट-वे ऑफ इण्डिया पर इकतारा बजाता है तो लोग उसे भिखमंगा मान लेते हैं? इसके उलट लंदन के किसी चौराहे पर बैठ कर राहगीरों के चित्र बनाकर पेट भरने वाला चित्रकार इज्जत और दौलत दोनों पाता है।

हमें यह भी सोचना होगा कि हमारी देशज भाषाएं गर्त में क्यों जा रही हैं? निज भाषा को उन्नति का मूल मानने वाले लोग कहाँ भटक गये हैं? हमारे नौजवान ललचाई नजरों से उन खबरों को पढ़ते हैं, जिनमें कहा जाता है कि यूरोप में रोजगार के नये अवसर खुलने वाले हैं। या, जापान अगले दस साल में दस लाख भारतीय युवाओं को रोजगार मुहैया करायेगा। वहां नौकरी के लिए आपको सिर्फ उनकी भाषा सीखनी है। हम अपनी भाषा, अपनी मिट्टी, अपना स्वत्व छोड़ दें तो सब पा सकेंगे। ये हम कहां आ गए हैं, जहां बंद मुट्ठी खाक की है और खुली मुट्ठी भी खाक की। हमें इस घातक चलन से छुटकारा पाना होगा। अपनी टीस का इलाज भी यही है।

shashi.shekhar @ hindustantimes. com

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