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अक्लांत योद्धा थे निशिकांत मंडल

पूर्वी मेदिनीपुर के नंदीग्राम की सोनाचुड़ा पंचायत के मुखिया निशिकांत मंडल की हत्या के प्रतिवाद में गत छह अक्तूबर को खेजुरी के कामार्दा से बड़ातला तक छह किलोमीटर लम्बी दूरी तक निकली पदयात्रा में दस हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए। यह इस बात का प्रमाण है कि निशिकांत अपने क्षेत्र में कितने जनप्रिय थे। निशिकांत ने पिछले वर्ष पंचायत प्रधान चुने जाने के बाद ही, अल्प समय में एक के बाद एक इतने जनकल्याणकारी कार्य किए कि माकपा के पूर्ववर्ती पंचायती राज से उनकी तुलना की जाने लगी। इसे माकपा बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसके सशस्त्र कैडरों ने दुर्गापूजा के ऐन मौके पर चतुर्थी के दिन सोनाचुड़ा के हालदार मोड़ के पास निशिकांत मंडल की हत्या कर दी।

पंचायत प्रधान बनने के बाद निशिकांत ने अपने इलाके में दो लाख 88 हजार स्थानों पर वृक्षारोपण कराया। वे सभी बचे हुए हैं। इनमें अधिकतर आकाशमणि और यूक्लिप्टस के पेड़ हैं। निशिकांत ने वर्षा के पानी के संरक्षण के लिए मिट्टी काटकर जगह-जगह पोखरे बनवाए। ये सारे काम उन्होंने स्थानीय लोगों को सौ दिन की जवाहर रोजगार योजना के तहत काम देकर कराए। इसी निशिकांत मंडल ने सोनाचुड़ा स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापना से लेकर उसे सुचारु रूप से चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। निशिकांत नंदीग्राम नरसंहार के पीड़ितों की यथासंभव मदद में लगे रहते। उस नरसंहार में मरनेवालों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने कहां-कहां भाग-दौड़ नहीं की?

सोनाचुड़ा स्वास्थ्य केन्द्र प्राय: अकेले निशिकांत पर निर्भर था। डॉ. देवप्रिय मल्लिक जैसे कई चिकित्सक वहां ग्रामवासियों की नि:शुल्क चिकित्सा के लिए जाते। जो भी उस अस्पताल में जाते, उनके इलाज, रहने यहां तक कि खाने-पीने का प्रबंध भी निशिकांत करते। निशिकांत पहले माकपा की राजनीति करते थे। माकपा के कट्टर समर्थक थे, किंन्तु 14 मार्च 2007 के नंदीग्राम गोलीकांड के बाद उन्होंने माकपा को छोड़ दिया और शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में चल रहे भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के आंदोलन में शामिल हो गए।

नंदीग्राम की हिंसा के दौरान सातेंगावड़ी और आस-पास के लोगों को बचाने के लिए निशिकांत ने बहुत मेहनत की थी। संत्रस के दिनों में वे हिंसा में उजड़े लोगों को वैन रिक्शा पर बिठाकर सुरक्षित स्थानों पर ले जाते। उनके भोजन, कपड़े-लत्ते का प्रबंध करते।

पंचायत प्रधान बनने के बाद भी उनकी कर्मनिष्ठा अक्षत रही। ईमानदारी अक्षुण्ण रही। पंचायत के एक-एक पैसे का वे हिसाब रखते थे। इलाके में सौ दिन का रोजगार किसको कितना मिला, उस योजना के तहत किस स्कूल के कमरे की मरम्मत करानी है, कहां पोखरा बनवाना है, कहां पेयजल का प्रबंध करना है, इन्हीं चिंताओं में उनका दिन खत्म हो जाता था। पंचायतों में किस तरह काम हो सकता है, निशिकांत ने करके दिखाया और हमारे सामने एक उदाहरण भी रखा कि पंचायत प्रधान के लिए क्या कुछ करणीय है और क्या कुछ वह कर सकता है। पंचायतों को निशिकांत से प्रेरणा लेनी चाहिए।

निशिकांत से मेरा समीपी परिचय दो साल पहले नंदीग्राम आंदोलन के दौरान हुआ। मैं नंदीग्राम जब भी गई, मेरे ठहरने का प्रबंध उन्होंने ही किया। निशिकांत का घर नंदीग्राम अंचल के गांवड़ा में है। वहां उन्होंने एक घरेलू अनुष्ठान में मुझे आमंत्रित किया था पर मैं पांव फूल जाने, रक्तचाप बढ़ जाने से नहीं जा पाई। लेकिन जब-जब निशिकांत से भेंट हुई, मुझे नदी में स्नान जैसी अनुभूति हुई। पंचायत प्रधान बनने के बाद ही उसने कहा था कि इलाके के रास्ते बनाएगा, स्कूलों की मरम्मत कराएगा, वृक्षारोपण कराएगा। बारिश के पानी का संरक्षण करने के लिए पोखर बनवाएगा। उसने अपने सभी वादे पूरे किए।

निशिकांत ने दिखलाया कि यदि मजबूत इच्छाशक्ति हो तो सालभर में भी बहुत कुछ काम किए जा सकते हैं। नंदीग्राम के अशोक प्रधान और सत्यजित मंडल कहते हैं कि निशिकांत जैसे सभी नेता हो जाएं तो बंगाल का चेहरा ही बदल जाएगा।

निशिकांत के जाने से मैं अनवरत शून्यता का बोध कर रही हूं। इस रिक्तता को कौन भरेगा? इलाके के गरीबों, मां-माटी-मानुष के पक्ष में समर्पित ऐसा जीवन मैंने कम देखा है। मेरी राय में निशिकांत अक्लांत योद्धा थे। उनकी स्मृति में नंदीग्राम में शहीद बेदी बनाई जानी चाहिए। सोनाचुड़ा का शहीद स्मृति स्वास्थ्य केन्द्र तो उसके नाम पर रहेगा ही।

मुझे लगता है कि जिस ढंग से निशिकांत की हत्या हुई, हत्यारों को पता था कि वह कब कहां जाता है। सुनियोजित ढंग से उसकी हत्या हुई। उसकी हत्या के प्रतिवाद में बंगाल में जिस तरह सभाएं हुईं, जुलूस निकाले गए, वही काफी नहीं है। हालांकि प्रतिवाद भी जरूरी है। यह मांग चारों ओर से उठनी चाहिए कि निशिकांत की हत्या की सही ढंग से जांच हो। उन सब हत्यारों को कड़ी सजा दी जाए। अभी तक इस मामले में सिर्फ तीन लोग पकड़े गए हैं।

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