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मीडिया साक्षरता की जरूरत

मीडिया शिक्षा की अनेक ध्वनियाँ हैं इसलिए लोग इसके अलग-अलग अर्थ निकालते हैं। अधिकतर विद्वान इसका अर्थ अख़बार, रेडियो और टेलीविज़न का प्रशिक्षण देना लगाते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस शब्द का तात्पर्य बच्चों को मीडिया के प्रति जागरूक बनाने की पढ़ाई से है और इसका उद्देश्य बच्चों में नैतिकता जगाना भी है। भारत में अभी इस विषय के जानकार अधिक नहीं हैं लेकिन कुछ जनसंचारविद् और गाँधी स्मृति न्यास के कुछ उत्साही युवा इस क्षेत्र में कुछ काम कर रहे हैं।

कुछ वर्ष पहले शिक्षा और शोध की राष्ट्रीय परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा 11वीं और 12वीं में पहले हिन्दी के प्रयोजनमूलक पाठ्क्रम के लिए मीडिया का एक अंश लागू किया, फिर उसने मीडिया अध्ययन को एक विषय के रूप में विद्यालयों में पढ़ाए जाने की योजना बनाई। लेकिन इन सब प्रयासों में पत्रकारिता या मीडिया प्रशिक्षण, मीडिया साक्षरता और मीडिया शिक्षा के बीच के अंतर को समझने का प्रयत्न नहीं के बराबर प्रतीत होता है। कारण यह भी है कि ऐसे पाठ्यक्रमों की योजना बनाते समय कोई व्यापक विमर्श हुआ हो इसकी ख़बर नहीं है, ले-दे के कुछ विशेष विशेषज्ञ ही हर जगह अपना एजेंडा थोपते दिखाई देते हैं।

क्या हमारा उद्देश्य बच्चों को अख़बार निकालना, रेडियो और टेलीविज़न के कार्यक्रम बनाना सिखाना है या समाज में मीडिया के भीमकाय स्वरूप और व्यापक प्रभाव को देखते हुए उनमें मीडिया के इस्तेमाल की, उसके क्रिटिकल पाठ की चेतना जाग्रत करना है। एक और उद्देश्य यह हो सकता है कि उच्च शिक्षा में जाते समय यदि बच्चे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में जाना चाहते हैं तो पत्रकारिता के बारे में भी उन्हें इतनी जानकारी हो कि वह चिकित्सा, अभियांत्रिकी, प्रबंधन जैसे व्यवसायों को चुनते वक्त इस व्यवसाय के बारे में भी सोच सकें।
 
मीडिया अध्ययन और मीडिया साक्षरता पर गंभीरता से विचार करने वाले यह मानेंगे कि इन दोनों का उद्देश्य मीडियाकर्मी तैयार करना नहीं है, बल्कि उन लोगों तक मीडिया के काम करने के तरीकों की जानकारियाँ पहुँचाना है जो भले ही अपने संदेश वहाँ से प्रसारित करवाने के लिए या वहाँ से प्राप्त संदेशों और जानकारियों का फायदा उठाने के लिए मीडिया के उपभोक्ता हैं। मीडिया साक्षरता का महत्व आज पहले से कहीं अधिक इसलिए भी हो गया है कि बाज़ार और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की वजह से मीडिया का स्वरूप बहुत बदल चुका है। 

वैसे भाषा शिक्षण से लेकर मीडिया अध्ययन या प्रशिक्षण तक स्कूली शिक्षा में विद्यार्थियों में विचार करने और अपने विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने की क्षमताओं का विकास करने पर सबसे अधिक ज़ोर देने की आवश्यकता है। स्मृति को ज्ञान के बोझ से त्रस्त करने के और उसे गुणात्मक रूप से ग्रहण करते जाने के बजाए उसकी मदद से विश्लेषण करने और अपने आस-पास की दुनिया की समझ विकसित करने के लिए ही बच्चों को किसी भी माध्यम की शिक्षा दी जानी चाहिए।

गाँधी स्मृति न्यास ने 2003 में दिल्ली से चार पन्नों वाली बच्चों की एक पत्रिका यमुना की शुरूआत की, जिसे अगले ही वर्ष आठ पन्नों वाली पत्रिका बना दिया। आज यह देश भर में सात शहरों के कुछ विद्यालयों के अलावा नेपाल तथा मैक्सिको के बच्चों के बीच एक सफलतापूर्वक संवाद चला रही है, जिसमें पत्रकारिता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों इस अख़बार के माध्यम से एक अहिंसात्मक विश्व बनाने के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय विषयों के बारे में सोच रहे हैं और अपने को अभिव्यक्त कर रहे हैं।

दुर्भाग्य से हिंदी में इस पत्रिका के केवल तीन अंक ही निकल पाए। इससे पता चलता है कि भारत में मीडिया शिक्षा अभी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले अभिजात्य वर्ग के लिए ही प्रासंगिक है और ऐसे प्रयोग करने वाले कई बार भारतीय भाषाओं में थोड़ा बहुत काम इसलिए भी कर लेते हैं, ताकि उनके सरोकार व्यापक दिख सकें।

यह बहुत ज़रूरी है कि हम बच्चों और संचार माध्यमों के रिश्तों को उनकी विभिन्न छटाओं में देखने का प्रयास करें। बच्चों के लिए विभिन्न संचार माध्यमों का उपयोग सीखना उतना ही ज़रूरी है, जितना विभिन्न संचार माध्यमों से प्रसारित संदेशों को ग्रहण करने से पहले उनकी आलोचनात्मक समझ पैदा करना।

इस बात पर भी विचार करना आवश्यक है कि विद्यालयी शिक्षा के बाद जनसंचार के सिद्धांत, संचार माध्यमों के प्रयोग, आदि सिखाने की जगह हिन्दी, अंग्रेज़ी या ज्ञान के पारंपरिक विषयों में से किसी एक की बलि दे कर स्कूली शिक्षा में ही इसे विषय के रूप में पढ़ाने से क्या हम उस शिक्षित नागरिक को तैयार कर पाएँगे, जिसकी हमें आने वाले दिनों में बहुत ज़रूरत होगी।

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