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लोकनायक को भूलने लगे लोग

‘मेरा सरोकार इस बात से है कि मैं किस तरह के लोगों के साथ समाज में रहना चाहता हूं।’ निश्चय ही मैं झूठों और कातिलों के, ऐसे लोगों के समाज में नहीं रहना चाहता जिनमें एक-दूसरे के प्रति करुणा, सहिष्णुता, साथीपन की भावना नहीं है।’  ये शब्द 1948 में जयप्रकाश जी ने सोशलिस्ट पार्टी के महामंत्री के रूप में लिखे थे। आज भी ये शब्द उतने ही जीवंत व सार्थक हैं।

ये शब्द साक्षी हैं देश-समाज को बदलने, उसके सामने खड़े खतरे से आगाह करने और उसे नयी दिशा देने के लिए जेपी की छटपटाहट के। वाकई काफी बदल गया है आज का समाज। आज लोकनायक की 107 वीं जयंती हैं। उनके गांव जेपी नगर में श्रद्धांजलि सभा व गोष्ठी आयोजित होगी।

जेपी के आदर्शो पर चलने का संकल्प लिया जायेगा। इन सबके बीच ऐसा भी कोई है जिसकी कमी जेपी नगर के लोगों को खटक रही है। आखिर कुछ सालों में ऐसा क्या हो गया है कि आज उस गांव के प्रधान 70 वर्षीय छट्ठू यादव को यह कहना पड़ रहा है कि वे लोग अब अपने को ‘टुअर’ महसूस करने लगे हैं।

गांव के लोगों की मानें तो जेपी के मरने के बाद जब तक चंद्रशेखर जी जिंदा रहे इस गांव की आस जिंदा रही। चंद्रशेखर जी ने जेपी को दिये वचन को निभाते हुए गांव का पूरा ख्याल भी रखा, लेकिन उनके निधन के साथ ही ग्रामीणों के लिए सबकुछ खत्म हो गया है। अपने घर के मुख्यद्वार पर जेपी व प्रभावती जी की फोटो टांगकर उन्हें पूजने वाले 80 वर्षीय रामजनम साहू कहते हैं कि अंतिम बार जब जेपी गांव में आये थे तो उन्होंने चंद्रशेखर को अपने पास बुलाया और कहा था कि ‘अब इस अंधेरनगरी को तुम सम्भालो।’

यह कहते हुए रामजनम की बूढ़ी हो चली आंखें डबडबा जाती हैं। फिर संभलकर बोलते हैं, अब तो चंद्रशेखर भी नहीं रहे। जेपी नगर तो भगवान भरोसे ही है। गांव के 90 वर्षीय देवरतन यादव हों या फिर 50 साल के जगलाल राम जेपी की  चर्चा छिड़ते ही पता नहीं किस दुनिया में खो जाते हैं। बोले, अब तो ‘साहब’ कुछ नहीं रहा। जब तक चंद्रशेखर जी रहे उनकी जयंती पर बड़े-बड़े नेताओं का जमावड़ा लगता था। अब तो यहां कोई बड़ा जलसा भी नहीं होता।

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