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वसीयतनामा का वीडियो रिकॉर्ड भी सबूतः हाई कोर्ट

वसीयतनामा का वीडियो रिकॉर्ड भी सबूतः हाई कोर्ट

दिल्ली उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है है कि संपत्ति विवाद के समाधान के लिए वीडियो रिकार्डेड वसीयतनामा को सबूत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति एस मुरलीधर ने याचिकाकर्ता सयार कुमारी को उसके पति की दादी दिवंगत भंवरी देवी की संपत्ति में हिस्सा दिए जाने के पक्ष में फैसला करते हुए यह व्यवस्था दी।

उन्होंने कहा कि अदालतों में वसीयतनामा से जुड़े विवादों के समाधान में वीडियो या डिजिटल रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून के प्रावधानों तथा वेबकाम, डेस्क कंप्यूटर और इंटरनेट जैसे इलेकट्रोनिक साधनों की उपलब्धता के बीच रजिस्ट्रार वसीयतनामा के पंजीकरण के बाद से उसके क्रियान्यवन पर नजर रख सकता है।

न्यायमूर्ति मुरलीधर ने कहा कि अदालत चाहती है कि उप रजिस्ट्रार से रिकार्डेड वसीयतनाम के पंजीकरण के समय उसे लागू करने वाले तथा गवाहों पर विशेष ध्यान देकर उसके क्रियान्यवन पर नजर रखें। उन्होंने दिल्ली सरकार को वसीयतनामा की रिकॉर्डिंग के लिए दिशा निर्देश तैयार करने का भी सुझाव दिया।

याचिकाकर्ता के वकील अरुण मोहन ने कहा कि भंवरी देवी ने 1985 में मरने से पहले अपने विडियो रिकॉर्डेड बयान में कहा था कि वह अपने बेटे सागर मल को अब कोई संपत्ति नहीं देना चाहती है क्यों कि वह पहले ही उसे काफी धन दे चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि मेरा बेटा मुझसे अलग रहता है और वह मेरी देखभाल नहीं करता, इसलिए उसका मेरी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।

भंवरी देवी ने कहा था कि उनकी मृत्यु के बाद उसके गहने उनके पोते की पत्नी सयार कुमारी और प्रपौत्री मीता के बीच बांट दिए जाएं, जबकि कश्मीरी गेट स्थित मिनरवा टाकीज को उनके पोते अमराव सिंह को दिया जाए। उन्होंने सयार कुमार को वसीयतनामा को लागू करने का दायित्व सौंपा था। भंवरी देवी के बेटे सागर मल ने इसे 1986 में चुनौती दी थी और तब से मुकदमेबाजी चल रही थी।

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