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नक्सली समस्या से चिंतित ब्लॉग जगत

नक्सली समस्या से चिंतित ब्लॉग जगत

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में गुरुवार को पुलिस गश्ती पर हुए नक्सली हमले और झारखंड में अगवा पुलिस अधिकारी फ्रांसिस इंदुवर की हत्या जैसी घटनाओं से इन दिनों ब्लॉग जगत काफी चिंतित है। नक्सली हिंसा और उसके समाधान को लेकर ब्लॉग की दुनिया में लगातार चर्चा हो रही है।

‘अंदर की बात’ नामक ब्लॉग ने नक्सलियों द्वारा फ्रांसिस की हत्या पर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘‘फ्रांसिस की हत्या ने ऐसे समय में नक्सलवाद की सोच को सवालों के केंद्र में ला दिया है, जब सरकार इनसे निपटने की तैयारियों को अमलीजामा पहना रही है। एक साधारण कर्मचारी की हत्या को किसी भी लिहाज से कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है। एकदम साफ शब्दों में इसे नृशंस हत्या कहना ज्यादा ठीक होगा।’’

‘आम्रपाली’ ने गिरफ्तार नक्सली नेता कोबाद गांधी के जरिए नक्सली समस्या पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘दून स्कूल में पढ़ा-लिखा शख्स कोबाद गांधी भी हो सकता है केवल राहुल गांधी ही नहीं।’ ब्लॉग ने टिप्पणी की है, ‘‘अगर नक्सली समस्या पर हम दिल्ली के पॉश इलाके के किसी फ्लैट में बहस कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि वे हमारे ड्राइंग रूम में घुस गया है। वक्त आ गया है कि हम इस समस्या को वास्तविकता के स्तर पर झेलें न कि सिर्फ लफ्फाजी करके। अगर हम दून और लंदन में पढ़े हर आदमी को राहुल गांधी समझने की गलती करेंगे तो नक्सली वाकई राजधानी तक आ जाएंगे।’’

‘युवा संदेश’ ने नक्सल प्रभावित इलाकों पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि नक्सलियों के प्रभाव वाले इलाके में कोई भी विकासपरक काम करने के लिए ‘नक्सलियों की परमिट’ की जरूरत होती है। ब्लॉग ने टिप्पणी की है, ‘‘पक्की सड़क के ठेके पर 10 प्रतिशत चढ़ावा। कच्ची सड़क की ठेकेदारी पर सात प्रतिशत कमीशन। न कमीशन देने या चढ़ावा देने में आनाकानी का मतलब सिर्फ सजा-ए-मौत है। नक्सलियों के गलियारे में विकास का कोई काम करने का परमिट नक्सलियों से ही मिलेगा।’’

‘लोकशाही’ ने ‘हमारे कारण फैला नक्सलवाद’ शीर्षक से टिप्पणी की है और कहा, ‘‘राहुल गांधी ने देश में फैले नक्सलवाद के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा है कि राज्य सरकारें लोगों तक अपनी पहुंच नहीं बना सकीं, जिसके परिणामस्वरूप नक्सलवाद कई राज्यों में तेजी से फैल रहा है। अब सवाल उठता है कि आखिर विकास का पैमाना क्या है?’’

ब्लॉग जगत में नक्सली हिंसा पर चिंता जाहिर करते ऐसे कई ब्लॉग इन दिनों पढ़ने को मिल जाएंगे। ‘कड़वा सच’ ने एक कविता के जरिए टिप्पणी की है, ‘‘नक्सली उन्मूलन के लिए उठाए गए कदम, क्या कारगर नहीं थे/ कारगर थे तो फिर उन्मूलन क्यों नहीं हुआ/क्यों कदम उठ-उठकर लड़खड़ा गए..।’’

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