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..और अब बरेली से

सवाल उठता है-बरेली से क्यों? एक राष्ट्रीय माने जाने वाले अखबार को यहाँ से अपना समूचा संस्करण निकालने की जरूरत क्यों महसूस हुई? मैं इसे सवाल नहीं बल्कि भ्रांति कहना चाहूँगा। ‘हिन्दुस्तान’ ऐसा अखबार है जो खाँटी हिन्दी भाषी लोगों की जिंदगी में रचता-रमता रहा है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि असली भारत आज भी छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में बसता है। यहीं से हमारी आदिम आकांक्षाएँ हमें अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चमकने और चहकने का रास्ता सुझाती हैं। पूरी दुनिया में अपना डंका बजाने वाली तमाम हस्तियों पर इस माटी के दूध और पानी का कर्ज है। उनके विचारों ने यहीं से अँगड़ाई लेनी शुरू की थी। हिन्दी बोलने-समझने वालों को संख्या और समझ के मामले में किसी से कमतर आँकना नादानी होगी। बरेली से अखबार निकालने का फैसला करते वक्त हमारे मन में पहला खयाल यही था कि रुहेलों की इस सरजमीं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ पर इस देश की गंगा-यमुनी तहजीब सच्चे अर्थो में साँसें लेती है। पूरे देश में हिन्दू-मुस्लिम-सिखों के गाँव इतनी सघनता और सहजता से कहीं और नहीं बसते। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ रुहेलखण्ड में आकर अपना गजर्न-तजर्न छोड़कर शांत और जीवनदायिनी स्वरूप शायद इसीलिए धारण कर लेती हैं।
पर सिर्फ सहअस्तित्व, शांति, धीरता और वीरता से ही हम 21वीं शताब्दी की जरूरतों पर खरा नहीं उतरते। यह समय बहुत तेजी से बढ़ने का है। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि रुहेलखण्ड को वह दर्जा हासिल नहीं हुआ जो होना चाहिए था। इसकी तमाम वजहें हैं। उत्तर प्रदेश की विशालता में तीन अंतरधाराएँ हमेशा बहती थीं। कभी पूरब का नारा तो कभी पश्चिम का उद्घोष तो कभी पहाड़ को न्याय का निनाद। बीच-बीच में अलग रुहेलखण्ड की माँग उठी, पर सियासी नक्कारखाने में उसकी स्थिति तूती से ज्यादा कभी नहीं बनी। ‘हिन्दुस्तान’ का मकसद रहा है, अपने पाठकों को अपना हक पाने में मदद देना। हम वादा करते हैं कि आज से आपके साथ एक ऐसा अखबार होगा जिसके पास पूरी दुनिया में हो रहे बदलाव की नब्ज होगी और ‘ग्लोबल विलेज’ में आपको पूरी ताकत से प्रतिष्ठापित करने की प्रतिज्ञापूर्ण जिम्मेदारी भी। भरोसा रखें इस देश के 10 शीर्षस्थ अखबारों में सबसे तेजी से बढ़ते समाचारपत्र का आपसे यह वादा है। बिहार, झारखण्ड, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और उत्तराखण्ड के बाद ‘हिन्दुस्तान’ ने उत्तर प्रदेश की सरजमीं की सेवा का जो संकल्प लिया है उसके परिणाम आशातीत रहे हैं। ‘हिन्दुस्तान’ के भरे-पूरे पाठक परिवार में हर रोज अकेले उत्तर प्रदेश से 13, 666 नए सदस्यों का इजाफा हो रहा है। ऐसा तभी होता है जब अखबार आम आदमी की जिंदगी का कभी जुदा न होने वाला हिस्सा बन जाए।
एक बात और। ‘हिन्दुस्तान’ का मकसद उमंगों से उबलते किशोरों और युवाओं को उनकी मंजिल तक पहुंचाना है। यह हिन्दी का अकेला अखबार है जो खुद को नई पीढ़ी की तैयारी का प्लेटफार्म मानता है। ‘तैयारी’ एक शिक्षित और समृद्ध भारत की नींव रख रही है।

यह अखबार सपने नहीं दिखाता बल्कि सपने देखने वालों को मंजिल पाने के लिए रास्ता दिखाने और बनाने का काम करता है। यही वजह है कि बरेली में अखबार के लोकार्पण के लिए हमने राजनेताओं, ग्लैमरस लोगों या महानुभावों की फौज नहीं बुलाई। हमने उन बच्चों को यह जिम्मेदारी सौंपी जिन पर आने वाले दिनों का दायित्व है। चीन की कहावत है, हजार मील की यात्रा की शुरुआत एक नन्हें कदम से होती है। हमारे आपके साझे सफर का यह शुरुआती शुभ दिन है।

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