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निवेश करें संभलकर कहीं गच्चा न खाएं

किसी भी निवेशक के लिए परफैक्ट पोर्टफोलियो रखना तो कभी भी मुमकिन नहीं होता, लेकिन इतना तय है कि अगर हम जोखिम और खतरों से बचने का तरीका सीख लें, तो हमें निवेश की पथरीली राह में भी वित्तीय लक्ष्य हासिल करने में ज्यादा परेशानी नहीं आएगी। ज़ाहिर है, इस हाईवे पर भी संभलकर चलने की जरूरत है, वरना निवेश से हाथ धोना पड़ सकता है।

दिसंबर 2007 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था बूम पर थी, तो दिल्ली के 38 साल के व्यापारी विनोद कुमार ने अपने कुल्फी पार्लर के धंधे को बढ़ाने की योजना बनाई। वे अपने कारोबार को दिल्ली से बाहर (जैसे चंडीगढ़) तक फैलाना चाहते थे। चंडीगढ़ के एक मॉल मालिक से बात करके कुमार ने अपनी दुकान खोलने के लिए एक साल का वक्त ले लिया। चूंकि उस वक्त शेयर बाजार अपनी बुलंदियों पर था, तो उनके मित्र ने सलाह दी कि वे अपना पैसा एक साल के लिए म्यूचुअल फंड में निवेश कर दें, और बाद में इससे मिलने वाली आय को पूंजी के तौर पर कारोबार में इस्तेमाल कर लें। कुमार ने यह सलाह मानकर 4.23 लाख रुपए निवेश कर दिए। मगर इसके बाद जो हुआ, उसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की होगी।
एक साल बाद पूरी दुनिया में मार्केट मंदी के शिकार हो गए और भारतीय शेयर बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा। यह साल आगे चलकर पूरी दुनिया के शेयर मार्केट के लिए अब तक का सबसे खराब साल साबित हुआ। कुमार के लिए उनके सात म्यूचुअल फंड के पोर्टफोलियो का 2008 के अंत तक मानो कत्ल ही हो गया। कुमार को 2.16 लाख रुपए, यानी कि पोर्टफोलियो की आधी रकम की चपत लग गई।
खैर, गलती किससे नहीं होती? कुमार जैसे नए-नवेले निवेशक ही नहीं, मंजे हुए और हर जगह ठोक बजाकर पैसा लगाने वाले इन्वेस्टर भी कई बार गच्चा खा जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी गलती जो हमसे होती है, वह है अच्छे मार्केट के दिनों में असावधानी के चलते बुनियादी चीजों को ही नजर अंदाज कर देना। ऐसा इसलिए होता है कि उस दौर में हमारा पैसा दिन दूना रात चौगुना होता रहता है। केवल बाजार के लड़खड़ाने या औंधे मुंह गिरने पर ही हमें गलती का एहसास होता है, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

शेयर बाजार का कोई भी इंस्ट्रुमेंट इससे बच नहीं सकता, चाहे वह शेयर हो या म्यूचुअल फंड। आइए, एक नज़र डालते हैं, ऐसे ही कुछ खतरों और उनसे बचने के तरीकों पर।
जल्दी रिटर्न पाने का इरादा
कुमार के मित्र ने उन्हें यह सोचकर इक्विटी में निवेश की सलाह दी थी कि म्यूचुअल फंड सीधे निवेश के बजाय ज्यादा सुरक्षित रहेगा। लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा कि म्यूचुअल फंड भी पैसे को शेयर बाजार में ही लगाते हैं। इसलिए जब शेयर मार्केट गिरेगा, तो म्यूचुअल फंड कहां से बचेगा? हां, ये हो सकता है कि सीधे निवेश की बनिस्पत म्यूचुअल फंड पर इसका थोड़ा कम असर हो, क्योंकि फंड मैनेजर शेयरों के चुनाव में आपसे ज्यादा होशियार हो सकते हैं।
मगर फिर भी, गिरावट तो म्यूचुअल फंड में भी आएगी ही।
हमारी राय : अगर आप म्यूचुअल फंड से पैसा बनाना चाहते हैं, तो कम से कम तीन साल तक धैर्य के साथ इंतजार करें। और तीन साल ही क्यों, अगर मार्केट अच्छे नजर नहीं आ रहे, तो इससे भी ज्यादा समय तक सब्र रखने के लिए मानसिक तौर पर तैयार रहिए। लेकिन अगर आपको तीन साल के अंदर-अंदर पैसा वापस चाहिए, तो म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने से परहेज ही करिए।
अच्छी स्कीम बनाम अच्छी रिटर्न
अट्ठाईस साल की नलिनी चंद्रशेखर अपने परिवार में वित्तीय प्रबंध और निवेश की जिम्मेदारी खुद ही निभाती हैं। सत्रह साल की उम्र में नलिनी ने साप्ताहिक छुट्टी के दिन अपने पापा के शेयर सर्टिफिकेट्स संभालना शुरू कर दिया था, और तभी से वे निवेश के क्षेत्र में काम कर रही हैं। उन्हीं दिनों नलिनी ने शेयर बाजार में निवेश करना भी शुरू कर दिया था। इसके बाद उनका संपर्क कई शेयर दलालों और निवेश से जुड़े अन्य लोगों से होने लगा, जो उन्हें निवेश के टिप्स भी देने लगे।
मगर नलिनी ने गलती से म्यूचुअल फंड में निवेश को शेयर में निवेश की तरह समझ लिया। उन्होंने समझा कि जिस प्रकार स्टॉक मार्केट के सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी में क्रमश: 30 और 50 स्टॉक होते हैं, उसी प्रकार अच्छे म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में भी इतने ही फंड की जरूरत पड़ती है। वे कहती हैं, ‘मेरे पोर्टफोलियो में 35 स्टॉक थे, मैने सोचा कि अच्छी रकम कमाने के लिए इनकी संख्या और बढ़ानी चाहिए।’ उन्होंने 25 स्कीमों में निवेश किया - फिर पांच को बेच दिया और अब 21 स्कीमों में उनका पैसा लगा हुआ है।
हमारी राय: एक म्यूचुअल फंड स्कीम में 30 से 60 या इससे भी अधिक शेयरों में निवेश होता है। लोग अक्सर इस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं। शेयर और म्यूचुअल फंड में निवेश एक ही बात नहीं है, भले ही दोनों का संबंध शेयर में पैसा लगाने से हो। जब आप किसी कंपनी के शेयर में निवेश करते हैं, तो आप असल में उस कंपनी के भविष्य की संभावनाओं में निवेश करते हैं। लेकिन जब आप किसी म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो आप उसके फंड मैनेजर की होशियारी में निवेश करते हैं, जो एक रणनीति के तहत अलग-अलग सेक्टर के अलग-अलग शेयरों में आपका पैसा लगाता है। अगर आप इसी तर्ज पर कई सारी स्कीमों में निवेश करेंगे, तो खतरा ये है कि अलग-अलग फंड के जरिए आपका पैसा एक जैसे शेयरों में ही जा लगे। इससे नुकसान ज्यादा हो सकता है।
अगर किसी इंडस्ट्री में, जिसका कुल कारोबार 7,21,886 करोड़ रु. का है, और अलग-अलग श्रेणी की 800 स्कीमें हैं, तो आपको लंबी अवधि के लिए अच्छी रिटर्न के लिहाज से कई स्कीमें आसानी से मिल सकती हैं। मगर असरदार डाइवर्सिफिकेशन के लिए हम 7 से 10 स्कीमों के म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो की ही राय देंगे।
‘फंड नेट असैट वैल्यू’ का मसला
ज्यादातर नए फंड ऑफर (एनएफओ) 10 रुपए के लांच किए जाते हैं। कुछ एजेंट और म्यूचुअल फंड पहले से मौजूद फंड्स की नेट असैट वैल्यू (एनएवी), जो कई बार सैकड़ों में होती है, पर नए एनएफओ की शुरुआती 10 रुपए एनएवी को तरजीह देते हैं। कई निवेशक इस जाल में फंस जाते हैं।
पटना की 35 साल की कारोबारी उषा गुप्ता ने पिछले दो साल में बाजार में आए तकरीबन सभी एनएफओ खरीद लिए थे। जब शेयर बाजार गिरने पर उनका पोर्टफोलियो भी धड़ाम हो गया, तो उन्हें समझ में आया कि अच्छे रिकॉर्ड वाले पुराने फंडों की क्या कीमत होती है।
हमारी राय: दस रुपए के एनएवी वाले फंड और दूसरे पुराने फंड्स में कोई अंतर नहीं है। आप दस रुपए के एनएवी वाली स्कीम ए और बीस रुपए के एनएवी वाली पुरानी स्कीम बी में एक-एक हजार रुपए निवेश कर दीजिए। दूसरे शब्दों में कहें, तो आप स्कीम ए में 100 यूनिट और स्कीम बी में 50 यूनिट लेकर रख लीजिए। अब मान लीजिए कि दोनों स्कीमों ने अपना पूरा कॉर्पस एक ही शेयर में लगा दिया है, जो अभी 100 रुपए पर चल रहा है। अगर यह शेयर 10 प्रतिशत बढ़ता है, तो दोनों स्कीमों का एनएवी भी 10 प्रतिशत बढ़कर क्रमश: 11 और 22 रुपए हो जाना चाहिए। दोनों मामलों में आपके निवेश की कीमत 10 प्रतिशत बढ़ कर 1100 रुपए हो जाएगी।
स्कीम बी के एनएवी की कीमत स्कीम ए की बजाय ज्यादा होने का कारण ये है कि ये कुछ समय पहले से बाजार में थी और इसकी खरीद-बिक्री होती रही है। इसलिए हर हाल में बेहतर यही होता है कि पुरानी और परखी हुई स्कीम को ही तरजीह दी जाए, जो एनएफओ के मुकाबले बेहतर रिकॉर्ड रखती है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड
मजबूत म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो वह होता है, जो आपके जोखिम उठाने की क्षमता के हिसाब से डाइवर्सिफाई किया गया हो। लेकिन अगर आपका पोर्टफोलियो बेवजह किसी खास वर्ग की तरफ झुका है, तो इससे परेशानी हो सकती है।
सुजय मुखर्जी पुणे के 35 साल के आईटी प्रोफेशनल हैं। उन्होंने एक दोस्त के कहने पर तकरीबन सभी फंड हाउस के इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड में पैसा लगा रखा है। मुखर्जी ने अगले पांच साल में इकनॉमी में जबर्दस्त उछाल और इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में पैसे की बरसात के सब्जबाग दिखाते आक्रामक ऐड-कैम्पेन से प्रभावित होकर जितना संभव हो सकता था, उतना पैसा इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड में लगा दिया।
हमारी राय : इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे थीमेटिक फंडों में आपको ज्यादा जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि इनमें सेक्टर और शेयरों के केंद्रीकरण की वजह से जोखिम बढ़ जाता है। ये फंड अत्यधिक केंद्रीकृत होते हैं, क्योंकि ये केवल एक या दो सेक्टरों में ही निवेश करते हैं। 2008 में जब शेयर मार्केट धड़ाम हो गया, तो इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड में 57 प्रतिशत की गिरावट आ गई, जबकि डाइवर्सिफाइड फंड में केवल 53 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। हां, सोच समझकर इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड में निवेश करना अच्छी बात है। मसलन, अगर आपके पास निवेश के लिए रकम ज्यादा नहीं है और आप इस सेक्टर में जाना भी चाहते हैं, तो सीधे इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड में जाने के बजाय म्यूचुअल फंड के रास्ते से ऐसा करना ही समझदारी होगी। अच्छा तो ये रहेगा कि आप सेक्टर केंद्रित फंड को अपने पोर्टफोलियो का सहयोगी हिस्सा ही बनाएं।
माना कि जब बाजार बल्ले-बल्ले होता है, तो ऐसी बुनियादी चीजों का नजर अंदाज हो जाना आसान होता है, लेकिन जैसा कि आजकल देखने में आ रहा है, इसका हैंगओवर बहुत ही पीड़ादायक होता है।

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