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रिबोसोम

हाल में भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटरमन रामकृष्णन को रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें रक्त में प्रोटीन का निर्माण करने रिबोसोम्स की संरचना और कार्यप्रणाली के लिए यह पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया। रिबोसोम आरएनए और प्रोटीन में पाए जाने वाले कण होते हैं जो रक्त की हरेक कोशिका में मिलते हैं। रिबोसोम डीएनए को प्रोटीन सीक्वेंस में बदलते हैं। बैक्टीरिया आदि जीवों के रिबोसोम का ढांचा फर्क होता है।
रिबोसोम उस प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं जो न्यूक्लिक एसिड के जेनेटिक को प्रोटीन चेन में बदलते हैं। रिबोसोम्स एक संदेशवाहक आरएनए के साथ नत्थी रहते हैं जिसे वह अमीनो एसिड को सही सूची में लगाते हैं। अमीनो एसिड संदेशवाहक आरएनए मॉलीक्यूल्स के साथ स्थापित रहते हैं।
रिबोसोम की खोज 1950 के दशक में रूमानियाई जीववैज्ञानिक जॉर्ज पेलेड ने की थी। उन्होंने इस खोज के लिए इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल किया था जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ‘रिबोसोम’ नाम 1958 में वैज्ञानिक रिचर्ड बी. रॉबर्ट्स ने प्रस्तावित किया था। इस लिहाज से रिबोसोम्स और उसके सहयोगी मॉलीक्यूल्स गत सदी के मध्य ये विज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए हैं और आज उन पर काम काफी तेज गति से हो रहा है।
रिबोसोम की दो उप-इकाइयां होती हैं जो एकसाथ मिलकर प्रोटीन इकाई निर्माण की दिशा में काम करती हैं। प्रत्येक बड़े आरएनए मॉलीक्यूल में एक से दो बैक्टीरियल उपइकाई और एक से तीन यूकर्योटिक इकाइयां होती हैं। साथ ही कई छोटे प्रोटीन मॉलीक्यूल्स भी होते हैं।

 

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