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कार्तिक और कृष्ण

वह तो बारिश आ गई। और हल्की सी ठंड हो गई। नहीं तो लग ही नहीं रहा था कि कार्तिक का महीना शुरू हो गया है। कभी-कभी तो लगता था कि कहीं ये जेठ तो नहीं चल रहा है। सोचा कि क्या यह वही महीना है, जिसमें सुबह-सुबह नहाना तपस्या जैसा एहसास देता है। यों कार्तिक के ध्यान में आते ही राम याद आते हैं। उसका सबसे बड़ा त्योहार तो दीवाली ही है न। वह तो राम से ही जुड़ा हुआ है न। लेकिन अजीब बात है लोक का मन राम में कुछ कम लगता है। राम के साथ वे वैसा जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते जो कृष्ण के साथ करते हैं। राम के आगे वे नतमस्तक तो होते हैं, लेकिन उनके साथ खेल नहीं पाते। राम उनके पूज्य हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। उनके साथ रूठा-राठी नहीं हो पाती। लीला तो राम भी कर रहे हैं। लेकिन लोक का जुड़ाव उनमें नहीं हो पाता। कृष्ण जब लीला करते हैं, तो लोक जबर्दस्त जुड़ाव महसूस करता है। अपने सबसे नजदीक अगर लोक किसी देवता को पाता है, तो वह कृष्ण ही हैं।

जरा अपने लोकगीतों को तो देखिए। राम पर कुछ भी कहने से लोक कितना हिचकता है। शायद इसीलिए राम के महीने में भी कृष्ण लोक में छाए रहते हैं। शरद चांदनी बरस रही है। पूर्णिमा निकल गई तो क्या हुआ? अभी उसकी धीमे-धीमे कम होती चमक में भी जान है। शरद चांदनी में गोपियां परेशान हो रही हैं। अरे इन्हीं चांदनी रातों में कृष्ण ने उनके साथ रास किया था। अब वह सब कुछ छोड़ कर चले गए हैं। आ ही नहीं रहे। एक गोपी कह रही है-

‘कातक में पाती लिख भेजी, ऊधौ हांत संदेसा।
मिलने होय तौ मिल लौ स्वामी, न पीहें जहर कटोरा।’

ये कृष्ण को क्या हो गया है? गोपियों को तो छोड़िए, उन्हें अपनी राधा की भी सुध-बुध नहीं है।
‘राधका रोवें देख के कुंजों को। कह कह कृष्ण मुरार।’

लोक के परम देवता कृष्ण को नमन। अंडाल और मीरा ऐसे ही उनके प्रेम में पागल नहीं थीं। कार्तिक भी अजब महीना है। नाम कार्तिकेय पर है। महीना राम का है। पर लोक कृष्ण को याद करता है।

 

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