DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दो टूक (09 अक्तूबर, 2009)

वे हमारे मेहमान थे। उन्हें अतिथि धर्म निभाना था। खेलों की हमारी तैयारी की तारीफ करनी ही थी। लेकिन हमारा गिरेबां हमसे ज्यादा कौन जानता है। अभी तक कौन-कौन से निर्माण पूरे हो जाने चाहिए थे, खिलाड़ियों का प्रशिक्षण कितना पूरा हो जाना चाहिए था, यह हमसे ज्यादा और किसे पता होगा?

उन्हें खुद से ही पूछना होगा कि कहीं वे आग लगने पर कुआं खोदने वाली लापरवाही तो नहीं दिखा रहे? कहीं वे अहम चीजों को आखिरी पलों तक तो नहीं टाल रहे? आम नागरिकों के रूप में एक सवाल आपको और हमें अपने आप से भी करना है। क्या हमने अच्छे मेजबान वाली बेसिक आदतें सीख ली हैं? क्या हम खेलप्रेमियों की प्रेम से अगवानी के लिए तैयार हैं?

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:दो टूक (09 अक्तूबर, 2009)