DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नई शुरुआत या महज सद्भाव

प्रधानमंत्री बीस देशों के समूह (जी-20) की बैठक में भाग लेकर हाल ही में अमेरिका के पीट्सबर्ग नगर से लौटे हैं। इसके बाद बैठक की उपलब्धियों को लेकर बहुत सी परस्पर विरोधी रिपोर्ट आई हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार बैठक सद्भाव भरे वक्तव्यों से आगे नहीं बढ़ी, जबकि कुछ का मत है कि पीट्सबर्ग में एक नई शुरुआत हुई है। भारत जैसे विकासशील लेकिन गरीब देश के लिए इसका क्या महत्व है? क्या बैठक का यह संदेश है कि विश्व के शक्तिशाली देशों द्वारा भविष्य में भारत की आवाज बेहतर ढंग से सुनी जाएगी।

इन सवालों का जवाब जानने के लिए पहले जी-20 की पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। 1999 में 20 देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों का एक समूह (जी-20) गठित हुआ, जिसका उद्देश्य महत्वपूर्ण औद्योगिक तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को व्यवस्थित ढंग से साथ लाकर विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़े मुख्य मुद्दों पर विचार-विमर्श करना था। जी-20 की पहली बैठक 15-16 दिसंबर, 1999 को बर्लिन में हुई, जिसकी मेजबानी जर्मनी और कनाडा के वित्त मंत्रियों ने की।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था पर सहयोग और परामर्श का यह बीस अर्थव्यवस्थाओं (19 देशों और यूरोपीय यूनियन) का एक अनौपचारिक मंच है। जन्म से लेकर अब तक जी-20 के राष्ट्र प्रमुखों की तीन बैठक हो चुकी हैं। ये बैठक नवंबर 2008 में वाशिंगटन डीसी, अप्रैल 2009 में लंदन और सितंबर 2009 में पीट्सबर्ग में हुईं।

जी-20 के अंतर्गत विश्व के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 85 प्रतिशत, विश्व व्यापार (इसमें यूरोपीय यूनियन का व्यापार भी शामिल है) का 80 प्रतिशत और विश्व जनसंख्या का दो-तिहाई हिस्सा आता है। 2008 के वाशिंगटन सम्मेलन के बाद जी-20 का कद बढ़ने पर इसके नेताओं ने 25 सितंबर, 2009 को घोषणा की कि भविष्य में यह समूह दुनिया के विकसित देशों के समूह जी-8 की जगह लेगा।

जी-20 विकसित और विकासशील देशों का एक ऐसा समूह है, जिसमें विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर खुलकर सकारात्मक बहस की जाती है। इस समूह में 19 देश और यूरोपीय यूनियन शामिल हैं। समूह के साथ अंतरराष्ट्रीय संस्थान भी काम करें, यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के प्रबंध निदेशक, विश्व बैंक के अध्यक्ष आदि को भी बैठक में शामिल किया गया है। इस प्रकार जी-20 में दुनिया के हर हिस्से के औद्योगिक और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों को स्थान दिया गया है।

जी-20 देशों की वाशिंगटन घोषणा और लंदन शिखर सम्मेलन दो अवधारणाओं पर आधारित है। पहली यह कि दुनिया में मौजूदा मंदी के दौर से अकेले नहीं, मिलजुल कर निपटा जा सकता है। मतलब यह कि समन्वित प्रयास किए जाने की जरूरत है। इसके लिए व्यवहार में प्रत्येक देश को ऐसी वित्तीय नीतियां लागू करनी होंगी, जिससे घरेलू खपत में आई कमी की भरपाई की जा सके। जनता की क्रय शक्ति में वृद्धि के लिए कर कम करने होंगे, तभी मांग में वृद्धि की आशा की जा सकती है। मौद्रिक नीति में संशोधन के तहत ब्याज दर घटानी होगी ताकि उपभोक्ताओं और उद्योगों को सस्ती दर पर धन उपलब्ध हो सके।

दूसरा काम है विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के वर्तमान ढांचे में सुधार। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत और चीन जैसे विकासशील देशों के शेयर में वृद्धि ताकि उनके मतदान के अधिकार में इजाफा हो। इन संस्थाओं का गठन दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ था। फिलहाल इन पर विकसित देशों का कब्जा है, क्योंकि उनका वोट कोटा सर्वाधिक है।

दुनिया भर में मंदी से उभरने के संकेत मिल रहे हैं। ज्यादातर लोगों का मानना है बुरा दौर निकल चुका है। पीट्सबर्ग सम्मेलन में इस पर विचार हुआ और भविष्य में उठाए जाने वाले कदमों की संभावित रूपरेखा तैयार की गई। यह सच है कि दुनिया के देशों के समन्वित प्रयास से मंदी पर समय से पहले काबू पाने में मदद मिली है। इस लिहाज से पहले दो शिखर सम्मेलनों से उपयोगी नतीजे प्राप्त हुए हैं। पीट्सबर्ग बैठक में कुछ नए संकल्प लिए गए हैं। पहला है विश्व वित्त व्यवस्था व बैंकों की कार्यप्रणाली में सुधार। इनकी लापरवाही के कारण ही दुनिया मंदी की चपेट में आई। जिस हिसाब से ये बैंक अभी भी वेतन और बोनस बांट रहे हैं, उसे देखकर अंकुश  लगाए जाने की जरूरत है।

जहां तक अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थाओं में सुधार का प्रश्न है विकासशील देशों के शेयर का हिस्सा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में मात्र पांच प्रतिशत और विश्व बैंक में तीन प्रतिशत ही बढ़ाया गया है। यह सकारात्मक कदम तो है, किन्तु नाकाफी है। आज विश्व शक्ति संतुलन एशियाई देशों विशेषकर भारत व चीन के पक्ष में है, किन्तु कोटे में मौजूदा वृद्धि से यह परिलक्षित नहीं होता। खाद्य, ईंधन और वित्त के मुद्दे पर ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। पीट्सबर्ग सम्मेलन में दुनिया के तापमान में वृद्धि और मौसम परिवर्तन को लेकर भी कुछ वायदे किए गए हैं। अकुशल ईंधन का इस्तेमाल क्रमश: समाप्त करने और उसकी जगह ग्रीन ग्रोथ का वचन दिया गया है।

इन दोनों मुद्दों पर भारत ने एक कार्ययोजना बनाई है। उर्जा के मौजूदा विकल्पों के कारगर इस्तेमाल तथा पुन: प्रयोग के विकल्प पर उसने योजना बनाई है। हमने इस दिशा में अभी शुरुआत भर की है। तय लक्ष्य पाने के लिए विस्तृत कदम उठाए जाने की जरूरत है। वैसे भारत और चीन जैसे देशों के प्रति दुनिया का नजरिया बहुत सकारात्मक नहीं है। भारत के मुकाबले अमेरिका में प्रदूषण की दर प्रति व्यक्ति तीस गुना ज्यादा है। तरक्की के साथ-साथ भारत में प्रदूषण दर बढ़ेगी। उच्च विकास दर बनाए रखना और प्रदूषण व कार्बन डायआक्साइड उत्सजर्न पर नियंत्रण रखना कठिन चुनौती है। इन परस्पर विरोधी लक्ष्यों को पाना आसान नहीं है। इसके लिए तकनीकी में क्रांतिकारी बदलाव और भारी धन की जरूरत पड़ेगी। विकसित देश धन और तकनीकी मुहैया कराने का वचन तो दे रहे हैं, किन्तु समय ही बताएगा कि वे अपना वायदा कैसे पूरा करते हैं।
 
पीट्सबर्ग सम्मेलन में जी-20 को स्थायित्व प्रदान करने का संकल्प लिया गया जो एक सकारात्मक कदम है। इसके बाद वैश्विक मुद्दों पर निर्णय लेते समय भारत और अन्य विकासशील देशों की राय पर ध्यान दिया जाएगा। भारत को अब एक मंच मिल गया है। इस अवसर का सदुपयोग करना हम पर निर्भर करता है। हमारे सामने आर्थिक मंदी से उबरने, ग्लोबल वार्मिग से निपटने के लिए दिए अपने वचन को पूरा करने की चुनौती है। सबके बीच यह ध्यान रखना जरूरी है कि इसका लाभ ग्रामीण भारत को भी मिले। 

लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केन्द्र सरकार में सचिव रह चुके है।

hindustanfeedback @ gmail. com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:नई शुरुआत या महज सद्भाव