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बाढ़ : दक्षिण में तबाही और राजनीति

भारत के लिए बाढ़ कोई अजूबा नहीं है। हर साल कहीं न कहीं बाढ़ आती ही है। देश के दक्षिणी प्रायद्वीपीय हिस्से में समुद्री चक्रवात का खतरा भी रहता है, जो बाढ़ की तरह ही भारी तबाही लाते हैं। बाढ़ हो या तूफान नतीजा एक जैसा ही होता है- बस्तियां उजड़ जाती हैं, कई इंसान और मवेशी अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं, फसलें तबाह हो जाती हैं। और इसके पहले कि सरकार नुकसान की भरपाई कर पाए अगली तबाही दस्तक दे देती है।

देश के तकरीबन सभी हिस्सों में बाढ़ और चक्रवात सबसे ज्यादा लोगों की जान लेते हैं। लेकिन इस हफ्ते आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में जो बाढ़ आई वह कुछ ज्यादा ही भयानक थी।  मौसम विज्ञानियों का कहना था कि इसका कारण बंगाल की खाड़ी का चक्रवात है, जो दक्षिण की ओर बढ़ रहा था। कर्नाटक के 11 जिलों में यह बाढ़ लगातार तीन दिन तक तबाही लाती रही, जबकि आंध्र प्रदेश के चार जिलों मे लगातार पांच दिन तक मूसलाधार बारिश होती रही।

कर्नाटक के जिन जिलों में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, उनमें बीजापुर, बागलकोट, रायचूर, कोप्पल, बेलारी और गडग हैं। जबकि आंध्र प्रदेश के महबूबनगर, कुरनूल, कृष्णा और गुंटूर जिले को सबसे ज्यादा मुश्किलें ङोलनी पड़ी। बाढ़ की परेशानी बाद में आंध्र प्रदेश को सबसे ज्यादा ङोलनी पड़ी क्योंकि कर्नाटक और महाराष्ट्र के ऊपरी स्थानों से पानी कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों से होता हुआ वहां पहुंच गया। इस तेज बारिश के कारण श्रीसेलम, नागाजरुन सागर और प्रकाशम बांधों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो गए।

बाढ़ इस देश में हर साल ही आती हैं, इसलिए प्रशासन से यह उम्मीद तो की ही जाती है कि वह ऐसे आपातकाल के लिए हमेशा तैयार रहे और स्थिति आते ही सक्रिय हो जाए। लेकिन इसमें भी गुटबाजी की राजनीति ही दिखाई दी, खासतौर पर आंध्र प्रदेश में फिलहाल राजनैतिक अस्थिरता चल रही है। कर्नाटक में इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। वहां प्रभावित जनता को राहत देने के सवाल पर जब कांग्रेस ने रैली निकाली तो राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एस आर नावक ने काफी तीखी टिप्पणी की।

मुख्यमंत्री येदयुरप्पा ने बाढ़ की स्थिति पर सर्वदलीय बैठक का आयोजन किया। उन्होंने सभी मंत्रियों से कहा कि वे प्रभावित जिलों में जाकर शिविर लगाएं और राहत कार्यो पर नजर रखें। कर्नाटक से संसद में आए सभी केंद्रीय मंत्रियों ने इस मसले पर राज्य की भाजपा सरकार को पूरा समर्थन दिया और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके प्रधानमंत्री से राज्य को तुरंत राहत दिलवाई। येदयुरप्पा ने अलमाटी बांध के गेट बंद करवा दिए, जिससे जिससे कृष्णा नदी के अलमाटी और नारायणपुर बांधों से पानी कम मात्र में निकले और आंध्र प्रदेश के श्रीसेलम जलाश्य को ज्यादा नुकसान न हो।

इसकी तारीफ आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी की। अब रोसैय्या के लिए सबसे बड़ी मुश्किल राहत और पुनर्वास कार्यक्रम को लागू करना होगा। मीडिया का कहना है कि राज्य में बनी ‘जगन सेना’ इस राहत अभियान में बाधा डालने की कोशिश कर रही है। इस उम्मीद में कि इससे मुख्यमंत्री पर आरोप आएंगे और जगन के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं बढ़ेंगी। बारिश घटने और बाढ़ का पानी कम होने के बाद दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि इसे ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित किया जाए। जिसका अर्थ  होगा राहत के लिए राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से ज्यादा धन का मिलना। 

अभी तक उसे आपदा कोष से मदद मिल रही है, जिसमें 25 फीसदी धन राज्य सरकार को खर्च करना पड़ता है जबकि राष्ट्रीय आपदा घोषित होने पर पूरी मदद केंद्र सरकार ही देती है। हालांकि किसी भी प्राकृतिक आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की एक निश्चित प्रक्रिया है। इसके लिए सबसे पहले राज्य सरकार को केंद्र सरकार के पास एक ज्ञापन भेजना होता है। इसके बाद केंद्र सरकार की एक टीम इसका जायजा लेने आती है। इस टीम की सिफारिश एक उच्च स्तरीय कमेटी के पास जाती हैं, जिसमें गृह, कृषि और वित्त मंत्रलय के प्रतिनिधियों के अलावा योजना आयोग के उपध्यक्ष भी होते हैं। यही समिति तय करती है कि राष्ट्रीय आपदा कोष से कितनी मदद दी जाए। 

दसवें वित्त आयोग ने राष्ट्रीय आपदा कोष बनाने की सिफारिश की थी लेकिन उसने ‘राष्ट्रीय आपदा’ की कोई परिभाषा नहीं दी थी। जाहिर है कि इस मामले में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाय, जिसमें बाढ़ की पहली चेतावनी आते ही पूरा तंत्र सक्रिय हो जाए। इसके साथ ही बाढ़ और चक्रवात की आशंका वाले क्षेत्र के लोगों को प्रशिक्षित किया जाना भी जरूरी है।               

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

radhaviswanath73 @yahoo. com

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