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काबुल का धमाका

पिछले कई दशक से अफगानिस्तान सतत युद्ध का एक मैदान है, इसलिए लगातार बारूद की गंध से महकने वाली इसकी राजधानी में धमाकों का होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन काबुल में भारतीय दूतावास के बाहर कल जो धमाका हुआ उसका अफगानी समाज की रक्तरंजित जटिलताओं से बहुत कुछ लेना-देना नहीं है। न यह अफगानिस्तान के कबीलाई खाड़कुओं के किसी आपसी पचड़े का परिणाम लगता है, और न ही इसमें ऐसा कुछ है, जिससे यह कहा जा सके कि अलकायदा के तालिबान ने करजई या फिर अमेरिकी सेना को किसी चेतावनी के लिए यह पटाखा फोड़ा है।

अगर मकसद सिर्फ यही होता तो उसके लिए भारतीय दूतावास से कई और भी अच्छे ठिकाने हो सकते थे। तकरीबन सवा साल पहले भी भारतीय दूतावास के ऐन गेट पर एक धमाका हुआ था और जांच करने वाली अमेरिकी एजेंसियां इस नतीजे पर पहुंची थीं कि यह करतूत पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की थी। इस बार भी शक की सुई उसी तरफ घूम रही है। पाकिस्तान का आईएसआई समर्थित आतंकवाद अभी तक जो लड़ाई कश्मीर के गांवों, गली-कूचों से लेकर मुंबई के ताजमहल होटल तक लड़ता रहा है, उस लड़ाई को काबुल तक एक नया भौगोलिक विस्तार दे दिया गया है।

वैसे यह मसला सिर्फ भौगोलिक विस्तार का ही नहीं है, पाकिस्तान पिछले कई महीनों से अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी पर सवाल खड़े करता रहा है। अफगानिस्तान में भारत जो विकास कार्य कर रहा है, उस  पाकिस्तान ने लगातार आपत्ति दर्ज कराई है। जिसके पीछे उसका मकसद अमेरिका की अफपाक नीति में भारत को शामिल करना है। अफपाक नीति इस सोच के साथ बनी थी कि सिर्फ अफगानिस्तान से आतंकवाद का सफाया तब तक नहीं हो सकता, जब तक इसकी उन जड़ों को न खत्म किया जाए, जो पाकिस्तानी फौज, सियासत और समाज में हैं।

अफपाक नीति की कल्पना एक ऐसे ऑपरेशन थियेटर के रूप में थी, जिसमें एक साथ दो मरीजों को आतंकवाद के कैंसर से मुक्त करने के लिए लिटाया जाना था। पाकिस्तान इसमें भारत का नाम भी डलवा कर इस नीति को कश्मीर का मुद्दा उठाने का एक मंच बना देना चाहता है। वह अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि इस उपमहद्वीप की सारी समस्याओं की जड़ कश्मीर में ही है। अभी तक अमेरिका उसके इस तर्क से सहमत नहीं है, इसलिए वह तर्कों के बजाए बमों का सहारा ले रहा है। काबुल का धमाका इसी सिलसिले की ओर संकेत करता है।

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  • Web Title:काबुल का धमाका