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डागदर बाबू

गांवों में प्रैक्टिस करने के लिए डॉक्टर तैयार करने की मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की योजना सचमुच फायदेमंद हो सकती है बशर्ते कि उसके साथ जुड़ी समस्याओं का भी निदान किया जाए। यह व्यावहारिक लग सकता है कि ग्रामीण इलाकों से ही छात्र चुने जाएं और उनकी पढ़ाई ग्रामीण इलाके में ही हो लेकिन ज्यादा जरूरी यह है कि शहरी मेडिकल कॉलेजों की पढ़ाई को भी भारतीय जरूरतों के हिसाब से ढाला जाए। भारतीय समाज, उसके तौर तरीके, उसकी समस्याएं वगैरा की जानकारी चिकित्सा शिक्षा में शामिल नहीं होती जिससे सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि डॉक्टर मरीजों से ठीक से संवाद ही नहीं कर पाते।

डॉ. राणी वांग के महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में स्त्री रोगों पर किए गए एक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि डॉक्टर और मरीज के बीच भाषा और संस्कृति के फर्क से रोगों का निदान ही नहीं हो पाता। अगर हम ग्रामीण इलाकों के लिए अलग डॉक्टरों का इंतजाम कर देंगे इसका अर्थ है कि हम स्वीकार करते हैं कि हमारे तमाम मेडिकल कॉलेज सिर्फ शहरी क्षेत्रों के लिए डॉक्टर तैयार करने के लिए हैं। समस्या यह है कि हमारे शहरों की बड़ी आबादी हमारे गांवों की आबादी से सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर ज्यादा अलग नहीं है, और यह आबादी चिकित्सा व्यवस्था की खामियों को वैसे ही भुगतती है जैसे ग्रामीण आबादी।

जब आजादी के बाद चिकित्सा शिक्षा का विस्तार किया गया था तो यही सोचा गया था कि शिक्षा प्राप्त करने के बाद डॉक्टर सारे देश की जनता के काम आएंगे। अगर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि हमारे डॉक्टर बहुसंख्य आबादी के काम नहीं आ सकते और उसके लिए हमें अलग से संस्थान खोलने पड़ेंगे तो हमें अपनी चिकित्सा शिक्षा को फिर से जांचना होगा। अच्छा यह हो कि आणंद के इरमा की तर्ज पर संस्थान बने जिसकी प्रतिष्ठा आईआईएम से कम नहीं है लेकिन जो ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ही प्रबंधन सिखाता है। ऐसे संस्थानों से निकले डॉक्टर बाद में हमारे शहरी मेडिकल कॉलेजों में भी ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में पढ़ा सकते हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य का सवाल गांवों में सड़क, बिजली, साफ पानी और शिक्षा से भी जुड़ा है। इन सवालों से जूझने के बाद ही ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हो सकती हैं।

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