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class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कितने तैयार हैं हमारे खिलाड़ी

एक साल से भी कम समय और काउंटडाउन शुरू। सब ओर चर्चा है कि स्टेडियम अधूरे हैं पर ऐसी चर्चा कहीं नहीं है कि हम कितने मैडल लाएंगे। राजधानी में सब स्टेडियम बनने में देर हो रही है। इसकी खबरें तो लगातार आ रही हैं। पर आखिर हम किस तैयारी के साथ 53 देशों से आ रही 71 टीमों से भिड़ेंगे। इस पर गौर नहीं किया जा रहा।

भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी तो बहुत अधिक उम्मीद लगाए बैठे हैं। वे बताते हैं कि कॉमनवैल्थ यूथ गेम में हमने मैडल टैली में टॉप किया। सो दिल्ली में होने वाले कॉमनवैल्थ खेलों में भी हम अच्छे खासे मैडलों की उम्मीद कर सकते हैं। वह बताते हैं कि सरकार ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

750 करोड़ प्राइम मिनिस्टर ने दिए हैं जो खिलाड़ियों की ट्रेनिंग पर खर्च हो रहे हैं। वह कहते हैं कि सभी खेलों में हम अच्छा करने लगे हैं। इस पर ऊपर से एथलीटों की अंतराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग जारी है। सब नए तरीके से हो रहा है। उन्हें अच्छी खुराक, अच्छी ट्रेनिंग दी जा रही है। विदेशों में भेजा जा रहा है और दुनिया के श्रेष्ठ कोच यहां बुलाए जा रहे हैं। तमाम खेलों के कैंप लगे हुए हैं। सुरेश कलमाडी के अनुसार हम 71 टीमों में शीर्ष तीन टीमों में होंगे। पर क्या सरकार के बहुत अधिक धन खर्च कर लेने से पदक की गारंटी हो जाती है।

निशानेबाजी
सबसे पहले वह खेल जिसमें हमने ओलंपिक का स्वर्ण पदक जीता है। राज्यवर्धन सिंह राठौर के रजत ने जो आशा का दीपक जलाया था अभिनव बिंद्रा के स्वर्ण पदक ने उसकी लौ को और तेज कर दिया है। देश में नामी शूटरों की फेहरिस्त बढ़ती चली जा रही है, जो कर्णी सिंह रेंज पर धमाल मचाने को बेताब है। 150 शूटरों की फौज पुणे के कैंप में लक्ष्य भेदने में लगी है। परीक्षण और प्रशिक्षण से इनकी छंटनी चल रही है। इनकी निगाह 40 स्वर्ण पदकों पर टिकी है। देखें अपने पल्ले कितने पड़ते हैं।

राष्ट्रमंडल खेलों से पहले चार विश्व कप हैं। एक विश्व चैंपियनशिप है और फरवरी में दिल्ली में उसी जगह पर कॉमनवैल्थ चैंपियनशिप भी आयोजित की जानी है। ओलंपिक में ही हमें एक से अधिक पदक की आशा थी पर राठौर, गगन नारंग, रंजन सौढ़ी, अंजली भागवत जैसे निशानचियों के निशाने चूकने से बात नहीं बनी। खैर ओलंपिक में अधिक नहीं मिल पाए पर राष्ट्रमंडल खेलों में तो हम धमाल मचाते हैं। मैनचेस्टर से 14 स्वर्ण, 7 रजत और 3 कांस्य लेकर आए थे तो मेलबर्न से पिछले खेलों में 16 स्वर्ण, 7 रजत और 4 कांस्य लेकर लौटे। अब जबकि अपने ही घर में खेल हैं तो यह संख्या काफी बढ़ सकती है। इसकी तैयारी के लिए मार्सिलो ड्राडी और झांग शान पहुंच चुके हैं जबकि स्टानीस्लाव लापीडस का इंतजार हो रहा है। अपने राष्ट्रीय कोच सनी थॉमस तो जुटे ही हैं।

कुश्ती
राष्ट्रमंडल के देशों में तो हम कुश्ती में काफी मजबूत हैं। सुशील कुमार के ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद देश के पहलवानों को हौसले बुलंद हैं। वह भी देश के लिए पदक लाने को आतुर हैं। हाल ही में विश्व चैंपियनशिप में रमेश कुमार का 42 साल बाद आया पदक भी उम्मीद जगाने वाला है। राष्ट्रीय खेल संस्थान, पटियाला में कुश्ती का कैंप चल रहा है। इसके अलावा, सोनीपत में भारतीय खेल प्राधिकरण में भी कैंप लगा हुआ है। कुश्ती में हमें कनाडा और नाइजीरिया से टक्कर मिलने की उम्मीद है। राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से निकले पहलवानों का अभ्यास शिविरों के लिए चयन किया गया है।

पहलवानी में पुरुषों के अतिरिक्त महिलाओं की भी प्रतियोगिताएं हैं और सुखद पहलू यह है कि पुरुषों के साथ हमारे देश की कई महिला पहलवान अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। सामान्य अखाड़ों में जो कमी रह जाती है उसे दूर करते हुए इन शिविरों में विधिवत ट्रेनिंग दी जा रही है और पहलवान अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी भाग ले रहे हैं। जगमिंदर, हरगोविंद और पीआर सोंधी (महिलाओं के कोच) जैसे मंजे हुए कोच पहलवानों पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। 2006 के मेलबर्न खेलों में तो कुश्ती को शामिल ही नहीं किया गया था, पर 2002 के मैनचेस्टर खेलों में हमने कुश्ती के तीन स्वर्ण और तीन रजत पदक हासिल किए थे। पहलवानों को तैयार कर रहे कोच इस बार 10 पदकों की आस लगाए हुए हैं। दिसम्बर में होने वाली कॉमनवैल्थ चैंपियनशिप और अगले वर्ष मई में होने वाली एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता में हमारे पहलवानों की परीक्षा होगी।

मुक्केबाजी
इस खेल में भी हमें ओलंपिक पदक हासिल हुआ है। इस सफलता को अपने देश में चार चांद लगाने के लिए पटियाला में 44 मुक्केबाजों को ट्रेनिंग दी जा रही है। मेलबर्न से हम मुक्केबाजी के 5 पदक लाए थे जिनमें एक स्वर्ण, 2 रजत व 2 कांस्य पदक थे। 11 तैराकों की टीम चुनी जानी है जिसके कोच जीएस संधू होंगे। मुम्बई में सुपर कप में अंतिम एकादश का चुनाव होगा।

तीरंदाजी
कोलकाता के साई सेंटर में लगे शिविर के लिए 64 तीरंदाज चुने गए थे जिन्हें अगले महीने तक 8 कर दिया जाना है। लिंबा राम की देखरेख में तैयार किए जा रहे तीरंदाजों ने हाल-फिलहाल तो निराश किया पर अभी काफी समय है और अपने ही देश में होने वाली प्रतियोगिता में उम्मीद की जा रही है। इसी माह ढाका में होने वाली एशियन ग्रां प्री और अगले माह बाली में होने वाली एशियन चैंपियनशिप में फिर से खिलाड़ियों की तैयारी का अंदाज लगेगा। जबकि अगले साल तीरंदाजी के पांच विश्व कप हैं। मंगल सिंह चंपिया और झानू हांसदा दो खास उम्मीदें हैं।

टेबल टेनिस
इस खेल में चीन का बोलबाला है, जो राष्ट्रमंडल देशों का सदस्य नहीं है। पर सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और स्कॉटलैंड की टीमों में चीनी खिलाड़ियों की मौजूदगी हमारे अवसर कम कर सकती है। पिछली बार मेलबर्न में शरत कमल ने स्वर्ण जीता था जबकि पुरुष टीम ने भी गोल्ड जीता था और महिला टीम ने कांस्य। इससे पूर्व मैनचेस्टर में हमें तीन कांस्य हाथ आए थे। इस बार भी शरत और सुभाजीत साहा अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और चार पदक हमारे हाथ लग सकते हैं। भारत ने इटली के कोच मासीमो कोन्स्टान्टिनी को नियुक्त किया है, जिनके साथ भारतीय खेल प्राधिकरण के भवानी मुखर्जी भी कोचिंग कर रहे हैं।

विदेशी कोच की राय है कि भारत को यदि पदक जीतने का प्रयास करना है तो हमारे खिलाड़ियों को चीन में अधिक से अधिक प्रशिक्षण लेना चाहिए। उनकी राय सरकार ने मान ली है और उनके साथ खिलाड़ियों को चीन भेजा जाएगा। खिलाड़ी अपने हुनर को इसी माह होने वाले इंग्लिश ओपन में और लखनऊ में होने वाली एशियन चैंपियनशिप में आजमाएंगे। फिलहाल भारतीय खिलाड़ी पुणे, पटियाला और अजमेर में अभ्यास में जुटे हैं। 20 पुरुषों और 17 महिलाओं के 37 सदस्यीय दल को तैयार किया जा रहा है। कोच जल्दी ही खिलाड़ियों की छंटनी करके उन्हें कुल 24 करना चाहते हैं।

हॉकी
अस्सी साल बाद ओलंपिक में भाग न ले पाने की कसक अभी ताजी है। सो भारतीय हॉकी की जीत के बारे में प्रशंसक बहुत आशा नहीं लगाए होंगे। हां, 2002 में मैनचेस्टर से सोना लाने वाली महिला टीम से अलबत्ता आशाएं हैं। मेलबर्न में भी उन्हें रजत पदक हासिल हो गया था जबकि पुरुष टीम बैरंग लौटी थी। भोपाल में एम. के. कौशिक की देख-रेख में जोर-शोर से तैयारी में जुटी महिला हॉकी खिलाड़ियों के हौसले बुलंद हैं। उनकी तैयारी की असली परीक्षा बैंकॉक में होने वाले एशिया कप में होगी। इधर जोस बारसा जोर लगा रहे हैं।

देश में काफी अभ्यास कैंप करके बारसा के साथ पुरुष टीम कनाडा में सात टेस्ट की सीरीज खेलने गई है। पुरुष टीम को पहले चार देशों का आमंत्रण टूर्नामेंट में और मार्च में होने वाले विश्व कप में भाग लेना है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रमंडल खेलों से पहले उन्हें अजलान शाह कप में भी खेलना है।

टेनिस
लिएंडर पेस, महेश भूपति, सानिया मिर्जा, सोमदेव देववर्मन, रोहन बोपन्ना, युकी भांबरी। उम्दा दर्जे के टेनिस खिलाड़ियों की फेहरिस्त अपने पास होने के कारण भारत ने विशेष प्रयास से टेनिस को राष्ट्रमंडल खेलों में सम्मिलित कराया। वरना टेनिस इसका नियमित हिस्सा नहीं है। 20 लड़कों और 20 लड़कियों के दल को अनुभवी कोच जयदीप मुखर्जी, नंदन बल, इनरिको पिपर्नो, अरुण कुमार और नितिन कीर्तने से प्रशिक्षण दिलाने के चुना गया है।

हालांकि बड़े खिलाड़ी दिल्ली में लगाए जा रहे कैंप में लगभग हिस्सा नहीं ले पाते, क्योंकि वह बड़े टूर्नामेंट खेलने में लगे रहते हैं। निक बोलेटियरी में भी एक माह का कैंप लगाया गया था ताकि खिलाड़ियों की हिटिंग विश्व स्तरीय हो जाए। चीन में टेनिस क्रांति लाने वाले कोच डग मैकर्डी को विशेष रूप से इन खेलों के लिए टेनिस सलाहकार नियुक्त किया गया है। देववर्मन व युकी भांबरी जिस तेजी से उभर रहे हैं उससे स्वर्ण की उम्मीद सहज ही बन जाती हैं। सानिया देश में पदक की दावेदार हैं तो युगल में पेस और भूपति का तो जवाब ही नहीं है।

तैराकी
तैराकी के कैंप का श्रीगणेश बेंगलूरु में हुआ जिसके बाद राष्ट्रीय कोच प्रदीप कुमार 30 सदस्यों को लेकर दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया गए। वीरधवल खाडे, संदीप सेजवाल और अग्नीश्वर भी अपने कोच निहार अमीन के साथ यूरोप में ट्रेनिंग के लिए गए। अब 30 तैराकों का कैंप पुणे में लगेगा। इसी तैयारी की बिना पर हम तीन चार पदक की उम्मीद कर रहे हैं वरना रेहन पोंचा, अजरुन मुरलीधरन, पुनीत राणा और शिखा टंडन की हमारी नामी टीम मेलबर्न से खाली हाथ लौटी थी। अपने तैराकों की परीक्षा के लिए वियतनाम में एशियन इंडोर खेल, गुंगजाऊ, चीन में एशियाई तैराकी और ढाका में सैफ खेलों में होगी।

बैडमिंटन
बैडमिंटन का कोई कैंप नहीं लगा है। राष्ट्रीय कोच गोपीचंद का विचार है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन कर रहे खिलाड़ी अपनी तैयारी खुद कर रहे हैं। प्रतियोगिता से पहले दो माह का शिविर तैयारी के लिए काफी रहेगा। गोपीचंद के साथ हैदी इदरीस युगल के कोच हैं। दिनेश खन्ना, प्रकाश पादुकोन, सैयद मोदी, अपर्णा पोपट, गोपीचंद जैसे नामी खिलाड़ियों ने पूर्व में पदक जीते हैं। डेनमार्क में इसी माह सुपर सीरीज खेली जानी है। इसके फौरन बाद फ्रेंच ओपन और लगे लगे हांगकांग ओपन व चाइना ओपन भी हैं। यह प्रतियोगिताएं खिलाड़ियों को तैयारी में मदद देंगी। अनूप श्रीधर और चेतन आनन्द के साथ सानिया नेहवाल और दीजू व ज्वाला गट्टा की जोड़ी को खिताब का दावेदार माना जा रहा है।

एथलेटिक्स
कॉमनवैल्थ गेम में हमारे एथलीट कुछ विशेष नहीं कर पाते। 1978 से अब तक हमें एथलेटिक्स के केवल पांच पदक हासिल हुए हैं। एथलेटिक फेडरेशन के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी हालांकि इस बार आशान्वित हैं। बर्लिन विश्व एथलेटिक में बेहद खराब प्रदर्शन के बावजूद उन्हें अपने ट्रेनिंग प्रोग्राम से बहुत उम्मीद है। मैनचेस्टर में एक रजत व एक कांस्य तथा मेलबर्न में दो रजत के बाद इस बार देश में 6-7 पदकों की आशा की जा रही है। इसके लिए कोलकाता, बेंगलूरू और पटियाला के तीन साई सेंटरों में 200 एथलीटों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। त्रिकूद, रिले दौड़ और गोला व चक्का फेंक स्पर्धाओं में देश को आशा है।

भारोत्तोलन
डोपिंग के आरोपों में हमेशा से घिरी रही यह स्पर्धा हमें ओलंपिक मैडल दिला चुकी है। हालांकि अब तक हम राष्ट्रमंडल खेलों में 33 स्वर्ण, 39 रजत और 21 कांस्य यानी कुल 93 मैडल जीत चुके हैं, पर शैलजा पुजारी, प्रमीलावल्ली बोदारी, इडविन राजू और तेजिंदर सिंह के 2006 में ड्रग में पकड़े जाने के बाद से अधिकारी डरे बैठे हैं। मुख्य कोच हरनाम सिंह को संतोष है कि ड्रग में कोई नहीं फंसा। वीएस राव, रवि कुमार, गीता रानी और यमनाम चानू से पदक की उम्मीदें हैं।

स्क्वैश
स्क्वैश का ट्रेनिंग कैंप चेन्नई में चल रहा है। साथ ही 15 पुरुष और 12 महिलाओं के दल को मलेशिया, इंग्लैंड और मिस्र में भी प्रशिक्षण देने के लिए ले जाया जा रहा है। पाकिस्तान को इस खेल का उस्ताद समझा जाता है, पर ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड के खिलाड़ी भी किसी को भी हराने का माद्दा रखते हैं।

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