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तो दिसंबर में भी नहीं होगा गौला में खनन

क्षेत्र की ‘लाइफ लाइन’ गौला, चुगान और खनन के पेंच में उलझकर रह गई है। भले ही वन विभाग और वन विकास निगम गौला में खनन के बजाय चुगान के कितने ही दावे करें पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रलय की टीम अगले 10 साल के लिए नदी में चुगान की इजाजत देने से पहले यह जांचेगी कि पर्यावरणीय दृष्टि से लीज देना उचित होगा भी या नहीं। अगर ऐसा हुआ तो चुगान की इजाजत दिसंबर तक मिलना भी मुमकिन नहीं हो पाएगा।

गौला में चुगान को मंजूरी के लिए निगम की ओर से प्रस्ताव देहरादून में नोडल अधिकारी की ओर से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रलय को भेजा जा चुका है। मंत्रलय की टीम अगले महीने गौला के निरीक्षण के लिए आने वाली है। क्योंकि गौला में खनन की लीज खत्म हो गई है। मंत्रलय की टीम को गौला में 1497 हेक्टेयर चुगान क्षेत्र में दोनों ओर 25 फीसदी क्षेत्र छोड़कर 50 फीसदी क्षेत्र में अगले 10 साल के लिए चुगान की इजाजत देनी है।

इसमें मंत्रलय की टीम को एक तो यह देखना है कि पर्यावरण की दृष्टि से गौला नदी में खनन की इजाजत देना ठीक है या नहीं। दूसरे वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया नाम के एनजीओ के इस तर्क को भी परखना है कि गौला में चुगान से हाथी कॉरीडोर प्रभावित तो नहीं हो रहा।

प्रभागीय वनाधिकारी तराई पूर्वी वन प्रभाग विवेक पांडे का कहना है कि अगर मंत्रलय की टीम पर्यावरण की दृष्टि से गौला में चुगान की इजाजत देने के पहलू को देखती है तो इसमें काफी देर होगी। इसके कई कारण हैं।

इस हिसाब से दिसंबर में भी चुगान की इजाजत मिल पाना मुमकिन नहीं होगा। गौला से चुगान में लगे मजदूरों समेत एक लाखों को रोजगार मिलता है। पहले गौला में अक्टूबर से ही खनन शुरू हो जाता था। पिछले तीन- चार वर्षो से गौला खुलने में देरी होती जा रही है।

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