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कृषि क्षेत्र में चमत्कारी बदलाव की पहल

वैज्ञानिक यदि फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ उन्हें रोगमुक्त करने में रसायनों की जरूरत खत्म कर दें तो इसे चमत्कार ही कहा जाएगा। यह चमत्कारी बदलाव लाने में देश के एकमात्र राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो (एनबीएआईएम) दे नई दिल्ली से मऊ के कुसमौर में शिफ्ट होने के बाद ऐतिहासिक सफलता अर्जित की है। यहां के वैज्ञानिकों ने अथक प्रयास से चार साल के दौरान 2517 ऐसे सूक्ष्मजीव खोजे गए हैं जो बगैर किसी साइड इफेक्ट के पौधों की प्रतिरोधक क्षमता और उत्पादन बढ़ाने में सहायक साबित हुए हैं।

आम किसानों को इनका लाभ पहुंचाने के लिए टीके विकसित करने के लिए आणविक गुण चिह्नंकन का कार्य अंतिम दौर में है। ब्यूरो के निदेशक व वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. दिलीप के अरोड़ा का कहना है कि नई खोज कृषि रसायनों से सस्ती होगी और आदमी की प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि भी लाएगी। इस खोज से फसलों में मृदाजनित रोगों से बचाव के करागर टीके विकसित होंगे।

एनबीएआईएम के सूक्ष्मजीव संग्रह केन्द्र में कुल 2517 सूक्ष्मवर्धन उपलब्ध हैं जिनमें 2077 कवक, 394 जीवाणु, 36 एक्टीनोमाईसीट्स और दस यीस्ट के हैं। वैज्ञानिक इन्हें उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, अरुणाचल, असम, राजस्थान, बिहार, केरल और सुंदरवन क्षेत्रों से खोजकर लाए हैं। इसमें 600 सूक्ष्मजीवों का जर्मप्लाज्म गुण चिह्नंकन हो चुका है। वरिष्ठ वैज्ञानिक आलोक कुमार श्रीवास्तव बताते है कि लेह, असम, कच्छ आदि दुरूह व अतिवादी जलवायु वाले क्षेत्रों में जाकर वैज्ञानिक इनका मूल्यांकन कर रहे हैं।

सर्वेक्षणों में प्राप्त विभिन्न प्रजातियों स्यूडोमोनास, फ्लुरेसेंस, स्यूडोमोनास एरूजिनोसा, बैसीलस, सबटिलिस, बी.ब्रेविस, हाइपोस्रेला डिस्कोडिया, मैटरीजियम एनीसोपली, ट्राईकोडर्मा हजिर्यानस, टी.कोनिंघी और वर्टिसीलियम लेकानी सूक्ष्मजीव को प्रयोगशाला स्तर पर मृदाजनित रोगमूलक कवक (फंजाई) निरोधक पाया गया है। चने में सूखारोग की रोकथाम के लिए स्यूडोनोमास फ्लुरेसेंस पीएफ 4-92 को प्रभावी पाया गया। मैक्रोफेमिना फिसियोलिना संवर्धन से सीधे जीनोमिक डीएनए का एक ‘लघु सम्पाक’ तैयार किया गया।

इस तकनीक से समय की बचत होती है और केवल दो घंटे में तरल नाइट्रोजन के प्रयोग के बिना जीनोमिक डीएनए प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे जीवाण्विक टीके विकसित किए गए हैं जो मृदा लवणता के हानिकारक प्रभावों को कम करते हैं और लवण प्रभावित भूमि में गेहूं की पैदावार बढ़ाते हैं। इन सूक्ष्मजीवों में आठ प्रतिशत लवण सांद्रता पर आईएए और घुलनशील फास्फोरस पैदा करने की क्षमता होती है। निदेशक प्रो.दिलीप के अरोड़ा का कहना है कि पांच सौ और कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव बैंक का हिस्सा बनने की कतार में हैं।

इंग्लैंड और अमेरिका के कैब इंटरनेशनल से 1800 से अधिक भारतीय मूल के कवक यहां लाने की कार्रवाई चल रही है। कुछ प्रमुख सूक्ष्मजीवों की कृषि में उपयोगिता और जैव कीटनाशी टीकों का विकास भी ब्यूरो द्वारा किया जा रहा है जिससे रासायनिक कीटनाशकों का प्रभावी विकल्प किसानों को उपलब्ध कराया जा सके।

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