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सुंदर दीयों से सजे हैं बाजार

मिट्टी से बने दीयों के बिना दिवाली को अधूरा माना जाता है। अमावस्या की अंधेरी रात में जगमगाते ये दीये अंधेरे को दूर करके चारों ओर उजियाला कर देते हैं। बदलते वक्त के साथ फैंसी दीयों का चलन भले ही बढ़ गया है, फिर भी मिट्टी के दीए अपनी पारंपरिक गरिमा के साथ इस अवसर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। दीवाली के दिन घरों में कम-से-कम 5 दीये इस्तेमाल में लाने का चलन देखने को मिलता है।

पहाड़गंज में दीवाली के मौके पर सड़क पर दीये बेचने वाले सुरेश के अनुसार, एक दीया महज एक मुट्ठी मिट्टी, थोड़े-से पानी और गर्म आंच से ही नहीं बना, बल्कि इससे लोगों की जुड़ी आस्था इसे पावन रूप दे देती है। हालांकि वह यह भी मानते हैं कि महंगाई के इस दौर में कुम्हारों के लिए दीए बना कर अच्छी कमाई करना मुश्किल होता जा रहा है। सभी चीजें महंगी हो रही हैं, जबकि लोग पुराने दामों पर ही चीजें खरीदना चाहते हैं। इतना ही नहीं अब पारंपरिक दीयों को आधुनिक दीयों के अनुरूप भी खुद को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करना पड़ रहा है।

नया रूप-रंग
पहले दीयों का उपयोग सिर्फ रोशनी के लिए किया जाता था। लेकिन अब नए रूप-रंग के दीयों का उपहार में भी इस्तेमाल किया जाने लगा है। सुन्दर, आकर्षक और आधुनिक डिजाइन में रंग-बिरंगे दीयों के गिफ्ट पैक्स आपको आसानी से मिल जएंगे। मिट्टी व टेराकोटा से बने ऐसे दीये भी उपलब्ध हैं, जो लगभग 10 घंटे लगातार जलते हैं। बांसुरीनुमा दीयों से लेकर सींक शेप दीया, गणोश फेस, कठपुतली शेप  दीयों से लेकर अरोमायुक्त दीये,  मोम से बने दीये, इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी से घूमने वाले दीये भी बाजर की शोभा बढ़ा रहे हैं। हां इतना अवश्य है कि इनके लिए आपको ज्यादा जेब ढीली करनी होगी। फैन्सी व खूबसूरत दीयों की अच्छी रेंज आपको पुरानी दिल्ली के सदर बाजार में मिल जएगी। रकाब एंड संस के यहां  मिट्टी और मोम के फैन्सी दीयों की ढेरों वरायटी मौजूद है। बाजार में 40 रुपये सैकड़े से दीयों की रेंज शुरू होती है। वसे ऐसे दीयों की भी कमी नहीं है, जिनमें एक दीए की कीमत 500 रुपये है।  

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