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बहुत हद तक बदली है तस्वीर, कुछ और की दरकार

बहुत हद तक बदली है तस्वीर, कुछ और की दरकार

गुरुवार  को अपनी स्थापना के 77वां साल मना रही भारतीय वायुसेना ने आखिरी जंग कारगिल में दस साल पहले लड़ी थी। तब से अब तक तस्वीर बहुत हद तक बदली है, लेकिन जानकार कहते हैं कि देश की वायु सीमा महफूज रखने वाले बल को हमें ऐसा बनाना होगा कि वह दो पड़ोसी देशों के संयुक्त खतरे से एक साथ निपट सके।

आठ अक्तूबर 1932 को बतौर भारतीय शाही वायुसेना अपनी स्थापना के बाद से वायुसेना ने लगभग हर जंग में भाग लिया और देश के वायु क्षेत्र को महफूज रखा। वायुसेना का आखिरी बड़ा अभियान 10 साल पहले कारगिल जंग के समय वर्ष 1999 में हुआ था।

हालिया समय में एयरबोर्न वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (अवाक्स) युक्त एक विमान मिलने और विमानों को उन्नत बनाने से तस्वीर कुछ बदली है। वायुसेना की बड़े स्तर पर विमानों को खरीदने की भी योजना है।

इंडियन डिफेंस रिव्यू पत्रिका के संपादक भरत वर्मा की राय है कि चीन और पाकिस्तान हमारे समक्ष हमेशा एक चुनौती और खतरा बने रहेंगे। हमारी तैयारी कुछ ऐसी होनी चाहिये कि किसी भी संभाव्यता में हम एक साथ दोनों चुनौतियों से निपट सकें।

उन्होंने कहा कि वक्त आ गया है कि हमारे राजनीतिक दल और नौकरशाही वायुसेना की जरूरतों को समझें। हमारे साथ बड़ी समस्या निर्णय करने की प्रक्रिया की है। रक्षा सौदों के बारे में फैसलों में देरी हो जाती है जो ठीक नहीं है।


वर्मा ने कहा कि कारगिल युद्ध के बाद बीते 10 वर्ष में कोई खास बदलाव नहीं आया है। नये विमान जरूर हमें मिले, लेकिन अब भी हम जरूरी साजो सामान की खरीद प्रक्रिया के मामले में लालफीताशाही की गिरफ्त में हैं।

वायुसेना दो और अवॉक्स तथा 126 लड़ाकू विमानों की खरीद करेगी। वह रूस से 230 सुखोई के लिये समझौता कर चुकी है। इसके तहत अब तक 100 से ज्यादा सुखोई भारत को मिल चुके हैं। इजरायल निर्मित चालक रहित लड़ाकू वायु यान हैरोप (ड्रोन) को भी 2011 तक खरीदने की योजना है।

इस बारे में वर्मा कहते हैं कि अवॉक्स एक उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसे हासिल करने में भी हमें देरी हुई। रुस से जो कुल 230 विमान मिलेंगे, उनकी सुपुर्दगी में भी देर हो रही है। एयरबोर्न रिफ्यूलर के बारे में भी लेखाकार सवाल उठा चुके हैं।

उन्होंने कहा कि वायुसेना अब भी रुस पर निर्भर है। जब कभी विमानों की खरीद होती है, हम किफायती लागत के कारण रुस को चुनते हैं, क्योंकि निविदा में वह कम बोली लगाता है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि रुसी तकनीक अब पुरानी हो चुकी है।

वर्मा सुझाव देते हैं कि हमें अगर वायुसेना को मजबूत बनाना है तो निर्णय करने की प्रक्रिया में तेजी दिखानी होगी। रक्षा मंत्रालय में वायुसेना के आला अफसरों का एकीकरण करना होगा क्योंकि नौकरशाही वायुसेना की जरूरतों को समझ नहीं पाती।

वायुसेना की मिग-29 को उन्नत कर उनकी उम्र 25 वर्ष से बढ़ाकर 40 वर्ष करने और वर्ष 1980 के बाद खरीदे गये 60 युद्धक विमानों को भी आधुनिक बनाने की योजना है। पर उम्रदराज विमान अब भी वायुसेना के समक्ष चुनौती हैं।

हाल ही में वायुसेना प्रमुख कह चुके हैं कि वायुसेना की क्षमता चीन के मुकाबले एक तिहाई है। इस पर वर्मा ने कहा कि यह सही है। वायुसेना की स्वीकृत क्षमता 45 स्क्वाड्रन की है। लेकिन वह 28.5 स्क्वाड्रन के साथ ही काम रही है। यह अंतर पाटने की जरूरत है।

वायुसेना में रडार तकनीक विशेषज्ञ रह चुके सुनील बाली भी इस पर चिंता जताते हुए कहते हैं, चीन के मुकाबले हम अब भी कमजोर हैं। हमें ऐसी तैयारी रखनी होगी कि पाकिस्तान या चीन से अगर भविष्य में युद्ध हो तो हम दोनों से निपट सकें।

उन्होंने कहा कि हमें यह समझना होगा कि भारतीय उपमहाद्वीप में अगर अगला युद्ध हुआ तो वह वायुसेना के बूते पर होगा। इसके लिये हमें हमारी वायुसेना को दक्षिण एशिया और विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे मजबूत बल बनाना होगा।

अक्तूबर 1932 में वायुसेना की आधिकारिक स्थापना के समय इसमें छह प्रशिक्षित अधिकारी और 19 हवाई सिपाही थे। आजाद भारत में इसने पहले अभियान को अक्तूबर 1947 में अंजाम दिया जब उसके समक्ष जिम्मा जम्मू-कश्मीर से आए घुसपैठियों से निपटने का था।

वायुसेना की असल परीक्षा अक्तूबर 1962 में हुई जब भारत-चीन युद्ध छिड़ गया। उस वर्ष 20 अक्तूबर से 20 नवंबर के बीच वायुसेना के समक्ष चुनौती पर्वतीय क्षेत्रों में सैनिक और रसद पहुंचाने की थी। इसके बाद 1978 से 1988 के बीच बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम हुए। 20 नए तरह के विमान बेड़े में शामिल हुए और फ्रांस के लड़ाकू विमान मिराज 2000 से सज्जित दो स्क्वाड्रन तैयार की गयीं। वर्तमान में भारतीय वायुसेना को विश्व की चौथी सबसे बड़ी वायुसेना माना जाता है।

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