DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जय-सुरा की सनसनी से चेतना निस्पंद

विश्वव्यापी मंदी से उबरने के लिए आयोजित विश्व के 20 प्रमुख आर्थिक शक्तियों के समूह (जी-20) का तीसरा शिखर सम्मेलन अभी कुछ दिन पहले ही अमेरिका में पिट्सबर्ग शहर में सम्पन्न हुआ। उसमें लिए गए अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल था - जी-20 को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए अग्रणी मंच की संज्ञा देना। इससे भारत में उल्लास की एक लहर सी दौड़ गई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि यह पिट्सबर्ग सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण परिणाम है, जिसने अंतरराष्ट्रीय शासन-संरचना को और भी व्यापक बना दिया है।

भारत के मुख्य समाचार-पत्रों ने घोषणा कर दी कि इस निर्णय के बाद जी-20 ने अत्यंत शक्तिशाली सात राष्ट्रों के समूह (जी-7) का स्थान ग्रहण कर लिया है। इस पक्ष को भी उछाला गया है कि इसके कारण जी-20 के सदस्य राष्ट्र होने के चलते विश्व आर्थिक क्षेत्र में भारत की गरिमा पर चार चांद लग गए हैं। एक रेडियो वार्ता में इसके संचालक ने मुझसे पूछा कि बताएं, किस प्रकार इस निर्णय से भारत को एक महान आर्थिक शक्ति बनने में मदद मिलेगी?

हकीकत तो यह है कि जी-7 को जी-20 ने विस्थापित नहीं किया है। और न ही जी-7 द्वारा लिए जाने वाले सारे निर्णय अब जी-20 द्वारा लिए जाएंगे। विश्व के अधिकांश राजनैतिक मुद्दों, जैसे ईरान, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन, परमाणु अप्रसार, प्रक्षेपास्त्र सुरक्षा व्यवस्था पर निर्णय पहले की तरह ही जी-7 के मंच पर लिए जाएंगे। उसी प्रकार इन अतिशक्तिशाली राष्ट्रों के आपसी आर्थिक नीतियों का समन्वय- जिस हद तक यह संभव है, जी-7 के मंच पर ही होगा।

जी-20 के मंच पर उन अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मसलों पर बहस होगी, जिनका समाधान चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों के सहयोग के बिना नहीं हो सकता। इनमें से कुछ मुद्दे हैं: विश्वव्यापी आर्थिक मंदी, जलवायु परिवर्तन पर समझौता, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्यान्न सुरक्षा, दोहा दौर की व्यापारिक वार्ता की परिणति, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और मौद्रिक व्यवस्था में सुधार आदि। जी-20 को इन विषयों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए अग्रणी मंच बनाना, वर्तमान आर्थिक वास्तविकता को मान्यता देने के तुल्य है। इसकी चर्चा पिछले कई साल से हो रही थी। और ऐसा करना अपरिहार्य था। यह  विश्व आर्थिक संतुलन में आई आमूल परिवर्तन की संस्थागत स्वीकृति है।

जी-20 में भारत जैसे विकासशील राष्ट्रों की आवाज हमेशा धीमी और सहमी-सहमी सी रहेगी। क्योंकि उसमें विकासशील राष्ट्र अल्पमत में हैं। बीस में से आठ सदस्य विकसित हैं। नवां रूस है और दसवां यूरोपीय संघ जो प्रधानत: विकसित राष्ट्रों का समूह है। ग्यारहवां सदस्य है टर्की जो यूरोप का एक अंग माना जाता है। बाकी विकासशील देशों में कई अमेरिका के पिट्ठ हैं, जैसे मैक्सिको, सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया। अर्जेटाइना किस करवट बैठेगा, कहना मुश्किल है।

ऐसी परिस्थिति में जी-20, जी-7 के विचारों और निर्णयों पर ठप्पा लगाने का ही मंच होगा। क्योंकि ऐसा नहीं करने से हम अलग-थलग हो जाएंगे। और भारतीय नेता और उच्चधिकारी अलग-थलग होना भारतीय सभ्यता के खिलाफ समझते हैं। इसके अलावा जी-7 के मतों का विरोध करना राजनयिक शिष्टाचार के प्रतिकूल माना जाएगा। किसी भी हालत में जी-20 के मंच का इस्तेमाल विश्व आर्थिक व्यवस्था को समान और न्यायपूर्ण बनाने के लिए उसमें आमूल परिवर्तन कराने के लिए नहीं किया जा सकता। क्योंकि इस प्रकार के किसी भी प्रयास करने से हमें अंतरराष्ट्रीय माओवादी या ‘नक्सलवादी’ करार कर दिया जाएगा।

जी-20 से संयुक्त राष्ट्र संघ के 170 से अधिक राष्ट्र बाहर हैं। क्या उन्हें विश्व आर्थिक सहयोग वार्ता में भाग लेने का अधिकार नहीं है? उनके लिए केवल संयुक्त राष्ट्र संघ का मंच ही उपलब्ध है? और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय विधि के मुताबिक इस कार्य के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ही सही मंच है। इस संस्था के घोषणा पत्र (चार्टर) की प्रस्तावना में प्रावधान है : अंतरराष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना। चार्टर की धारा एक में प्रावधान है - इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विश्व के राष्ट्रों के कार्यो में सामंजस्य स्थापित करना। यह कार्य सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र से सम्बद्ध चार्टर के मुख्य अवयव इकोसौक के मंच पर होना चाहिए। यह भी स्मरण रहे कि संयुक्त राष्ट्र संस्था प्रत्येक सदस्य राष्ट्र की सार्वभौमिक समानता के सिद्धांत पर आधारित है। (धारा 2 (1))।

पिछले तीन दशकों से आर्थिक क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर प्रावधानों की विकसित देशों ने जानबूझ कर और आयोजित रूप से उपेक्षा की है। फलत: इस क्षेत्र में इस संस्था के कार्यो में लगातार ह्रास हुआ है। और ये सारे कार्य विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व वाणिज्य संस्था को हस्तांतरित कर दिए गए हैं। जी-20 के अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए एक अग्रणी मंच के रूप में उभरना संयुक्त राष्ट्र संघ के ह्रास की प्रक्रिया का तार्किक निष्कर्ष है। इसमें भारत की भी मुहर लगी है। ऐसा करते समय हम चार्टर को तो भूल ही गए। हम यह भी बिसरा बैठे कि हमारी विदेश नीति के प्रवर्तक पंडित जवाहरलाल नेहरू को संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति कितनी आस्था थी और किस प्रकार वे इसके बुनियाद पर एक विश्व-शासन व्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे। कविवर दिनकर का अनुकरण करते हुए कहा जा सकता है कि जी-20 की ‘जय-सुरा की सनसनी से चेतना निस्पन्द’ हो गई है।

और आखिरकार जी-20 से हमें क्या मिलेगा? हमारे द्वारा निर्यात किए गए जेनेरिक दवाइयों को जी-20 के विकसित राष्ट्र बरामद करते हैं, और हमारे साथ उसका विरोध करते हैं जी-77 के विकासशील राष्ट्र। जी-20 के विकसित देश अपनी कृषि संरक्षण की नीति द्वारा हमारे आर्थिक हितों पर आघात पहुंचाते हैं। उसके खिलाफ संघर्ष करने के लिए हमारे साथ है, विश्व वाणिज्य संस्था की व्यापार वार्ता के दौरान संगठित जी-33 के राष्ट्र-समूह, जो जी-77 में समाहित है।

हम बौद्धिक सम्पदा अधिकार के करारनामें में सुधार लाने चाहते हैं, जिससे विकसित राष्ट्र हमारे जैविक-संसाधनों को हड़प नहीं पाएं, जिससे माइक्रो-आर्गेनिज्म, जो विकासशील देशों में प्रचुर मात्र में पाए जाते हें, के पेटेन्ट के प्रावधान को रद्द कर दिया जाए। इसमें भी हमारा साथ जी-77 राष्ट्र-समूह दे रहे हैं। इस तरह के अनेक अन्य उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिससे यह प्रमाणित हो सकता है। भारत के तत्कालीन और दीर्घकालीन हितों की रक्षा के लिए विकासशील देशों की जी-77 एवं उसकी शाखाओं के रूप में विशेष मुद्दों से संबद्ध जी-33 (कृषि) जी-11 (नाभा) आदि देश-समूह, जी-20 से श्रेयस्कर है।

लेखक भारत के विदेश सचिव रह चुके हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:जय-सुरा की सनसनी से चेतना निस्पंद