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विवाद : विद्यार्थियों को न दें यह जानकारी

भारती जी के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ के प्रारंभिक पृष्ठ में छपी कविता के नीचे स्पष्ट शब्दों में कवि का नाम लिखा था- एंजेलो सिकिलियानो। उपन्यास के कथ्य से मेल खाती पंक्तियां थीं, इसलिए भारती जी ने उन्हें उद्धृत किया था। यह तो थी 1952 की बात, बाद में पूरी कविता ‘देशांतर’ में संकलित की गई थी। देशांतर 21 देशों की चुनी हुई कविताओं के भारती जी द्वारा किए अनुवादों की पुस्तक है। उसमें वह लम्बी कविता पूरी छपी है। शीर्षक है- सूर्योदय का गीत। यह पुस्तक भी 1960 में छप चुकी थी। अब इससे 1975 में लगे आपातकाल या भारती के सिद्धांतों का भला क्या संबंध।

सारे तथ्य जानने के बाद भी मन्नू जी अड़ी रहीं कि ‘माया का अंक लाकर दिखाओ। उसी में पढ़ा था कि ये कविता भारती जी ने लिखी थी।’ अब कहां से लाया जाए, सन 77 की माया और पचीसियों बरस पुरानी फिल्म। मुद्दे को टालने का क्या खूब बहाना! मनोहर आशी की बात गलत, सूरज का सातवां घोड़ा में छपा उद्धरण गलत, देशांतर में छपी कविता गलत, कवि का नाम एंजेलो सिकिलियानो गलत।

मैंने निवेदन किया कि जरूरी पढ़ी होंगी आपने माया, पर वो जानकारी गलत थी यह आप समझ क्यों नहीं पा रहीं? जैसे आरोप आप भारती जी पर लगा रही हैं, वैसा कवि एक मुनादी ही नहीं पर्व जैसी कविता भी लिखता है। तो बोलीं- ‘बाद में लिखी होगी’। जब बताया गया ‘सपना अभी भी में देख लीजिए, रचनाकाल अक्टूबर 1975 दिया हुआ है।’ अब पता नहीं उसे पढ़ने के बाद या उसे शायद मेरे निरंतर प्रयासों से थककर उन्होंने कहा- ‘आप चाहती क्या हैं?’ मैंने कहा- ‘मैं केवल इतना कहती हूं कि चूंकि विद्यार्थियों को यह पुस्तक पढ़ाई जाएगी, आप उसमें तथ्यात्मक सुधार कर लें।’ वे बोलीं- ‘मैं तो बीमार हूं, हाथ से कलम पकड़ी भी नहीं जाती, तुम ही लिखकर दे दो मैं हस्ताक्षर कर दूंगी।

मैंने कहा- ‘नहीं मन्नू जी ऐसा मैं कदापि नहीं करूंगी। यह काम तो आपको स्वयं अपने ढंग से करना चाहिए।’ तो उन्होंने कहा कि ‘ठीक है अपने प्रकाशक को बुलाकर बात करूंगी, मित्रों से सलाह लूंगी और कुछ न कुछ जरूर कर दूंगी।’ मैं निश्चिंत हो गई। समय गुजरता जा रहा था। जब फिर मैंने तकाजा किया तो बोलीं- ‘प्रकाशक कह रहा है कि मार्च में रॉयल्टी का हिसाब-किताब होगा, तब पता चलेगा कि संस्मरण की कितनी प्रतियां शेष हैं और अगला संस्करण कब छपेगा। अगले संस्करण में ही कुछ किया जा सकेगा।’

उन्हें पत्र लिखे लगभग डेढ़ बरस बीत चुका था। अंत में थककर अभी सितम्बर के दूसरे सप्ताह में जब मैंने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की तो इधर डेढ़ बरस के दौरान फोन पर मुझसे हमेशा स्नेह से बात करनेवाली, भारती जी के धर्मयुग में संपादक रहते हुए उन्हें सस्नेह विनम्रता के साथ लिखे पत्रों में मुझे हुस्ना बीबी कहकर संबोधित करते हुए नमस्ते भेजनेवाली मन्नू जी ने एक टुकड़ा वाक्य कहा- ‘आपको जो करना हो कर लीजिए। मेरी पुस्तक जैसी है, वैसी ही छपेगी।’ और खटाक! फोन पटक दिया।

मैं कुछ नहीं कर सकती, कोई कुछ नहीं कर सकता- कलम आपकी, पुस्तक आपकी, विश्लेषण आपका, प्रकाशक आपका- वही छपेगा जो आप चाहेंगी। आपकी आत्मकथा में पढ़ी जानकारी के अनुसार मैं तो राजेन्द्र जी की तरह यह नहीं कह सकती- ‘तुम तो परले सिरे की बेवकूफ हो..लोगों की क्या तुम्हें बिल्कुल पहचान नहीं है?’ (पृष्ठ 128) न आपकी उस स्वीकारोक्ति की ही आपको याद दिला सकती हूं, जिसमें आपने स्वयं लिखा है ‘सोच समझकर बोलना न मेरा स्वभाव था, न आदत। आज भी नहीं है।’ (पृष्ठ 58)।

मैं कुछ नहीं कर सकती..अभी मई-जून की ‘पुस्तक वार्ता’ पत्रिका में दामोदर दीक्षित की लिखी एक समीक्षा ‘तुच्छता का हठी आत्मप्रलाप’ शीर्षक से पढ़ी तो दंग रह गई। दीक्षित जी के पास बड़ी पैनी दृष्टि है, साहित्य की पैनी समझ है। बहुत सशक्त और समर्थ भाषा तथा प्रभावशाली चुस्त शैली है। वैसा कुछ भी यदि मेरे पास होता तो उसी शैली में आपकी इस पुस्तक के कुछ तथ्यों की अनर्गल तोड़-मरोड़ कर जरूर उजाकर कर देती पर अपनी सीमाएं जानती हूं।

मेरा मकसद आपको नीचा दिखाना या बदनाम करना कतई नहीं है, क्योंकि यह समझ रही हूं कि शायद आपके अपने निजी अध्ययन की कमी तथा किसी से उधार लिए हुए भ्रामक ज्ञान ने आपसे यह भूल करा दी है।
 
इसलिए सिर्फ यही कहूंगी कि हां, मन्नू जी मैं कुछ नहीं कर सकती! किंतु हां, आप जरूर यह कर सकती हैं कि यह मानकर कि बिना किसी दुर्भावना और बदनीयति के आपसे एक मानवीय भूल हो गई है- आप उस भूल को सुधार सकती हैं।

लेखिका हिंदी साहित्यकार हैं

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