DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सत्संग और विवेक

सत्संग का अर्थ सिर्फ साधु-संतों या ईश्वर के भक्तों के भाव ब्रह्म की चर्चा और उनका गुणगान करना मात्र नहीं होता, बल्कि किसी सत्पुरुष का सानिध्य प्राप्त करना या किसी सद्विचार को आत्मसात करना भी सत्संग ही होता है। सत्संग का अर्थ हुआ- सत्य का संग। ब्रह्म सत्य है। अर्थात सत्य ही ब्रह्म है। इसी सत्य की संगति को सत्संग कहते हैं। विवेक की उत्पति इसी सत्संग से होती है। विवेक निरंतर सत्संग से ऊर्जा प्राप्त करता रहता है।

मनुष्य जिस सत्पुरुष, सद्विचार या देवता में सत्य का दर्शन करता है, उसके प्रति पूर्ण विश्वास और श्रद्धा का भाव रखता है। जब तक मनुष्य इस श्रद्धा और पूर्ण विश्वास के साथ सत्संग में रहता है, तब तक उसका विवेक जागृत रहता है। किन्तु सत्य के प्रति उसके भीतर ज्यों ही विश्वास और श्रद्धा का भाव टूटता है, त्यों ही सत्संग टूट जाता है। सत्संग छूटते ही मनुष्य विवेकहीन हो जाता है। ऐसा सिर्फ आध्यात्मिक क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि भौतिक जगत में भी होता है। सत्पुरुष सदा सद्विचारी ही होते हैं। इसीलिए वे सर्वदा विवेकशील भी होते हैं।

मनुष्य या देवता जीवन के किसी भी क्षेत्र में अगर सत्य का निरादर करते हैं तो वे विवेकहीन कहलाते हैं। शिव-धनु तोड़ने वाले राम के सत्य रूप को परशुराम ने अहंकारवश नहीं पहचाना। राम में निहित परमसत्य के प्रति परशुराम के मन में न तो विश्वास था और न ही श्रद्धा। फलत: सत्य के सामने होते हुए भी वे सत्संग से दूर थे। ऐसी स्थिति में वे विवेकहीन होकर कहते हैं-
सुनहू राम जेहिं सिवधनु तोरा।
सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।

किन्तु उसी स्थल पर जब वे परमसत्य राम को पहचान जाते हैं तब उसी सत्य के प्रति श्रद्धा और विश्वास से भरकर सत्संग की प्राप्ति करते हैं। और तब उनका विवेक लौटता है। फिर वही परशुराम कहते हैं-
छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सत्संग और विवेक