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दलितों के द्वार पर

जब भी कोई राजनेता अपने वर्ग और जाति से नीचे उतर कर समाज के वंचित वर्ग से समरस होने की कोशिश करता है तो उसकी तारीफ भी होती है और विवाद भी पैदा होता है। वर्गअवतरण की प्रक्रिया को, विशेष कर तब जब वह सत्ता की राजनीति से जुड़ी हो, संदेह की नजर से देखा जाता है। महात्मा गांधी जब अछूतोद्धार का कार्यक्रम चला रहे थे, तब अंबेडकर ने उनकी कठोर आलोचना की थी। कुछ वैसी ही आलोचना आज तब हो रही है, जब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी दलितों के घर रात्रि निवास करते हैं या उनका अनुकरण करते हुए कांग्रेस के अन्य नेता वैसा कार्यक्रम बनाते हैं। 

महात्मा गांधी ने इस काम के लिए ‘हरिजन सेवक संघ’ बनाया था और खुद ‘हरिजन’ अखबार निकाला था।  सामाजिक चेतना का नया स्तर आने के बाद वे चीजें आज भले अप्रासंगिक हो गई हों, पर उनके ऐतिहासिक योगदान से कौन इनकार कर सकता है। उसी परंपरा को नया रूप देते हुए अगर राहुल गांधी और उनकी पार्टी के नेता दलित के घर में दरिद्र नारायण की तलाश कर रहे हैं तो इसमें हाय-तौबा मचाने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। राहुल गांधी ने यह काम पूरी सादगी से किया और उसकी तरफ समाज के संजीदा लोगों का ध्यान गया भी है। लेकिन वहां भी आलोचना करने वालों ने सुरक्षा का सवाल उठा कर उन्हें ऐसा न करने की सलाह दे डाली।
   
यह सही है कि वातानुकूलित जीवन के आदी हो चुके अन्य कांग्रेसी नेता जब वहां मिनरल वाटर की बोतलें और होटलों से शानदार बिस्तर व भोजन लेकर जाते हैं तो उससे वह सारा उद्देश्य भ्रष्ट हो जाता है, जिसे राहुल गांधी अपनी कड़ी मेहनत से सींच रहे हैं। उनके इस ढकोसले की सही आलोचना हुई है और तभी राहुल गांधी ने पार्टी के इस कार्यक्रम के लिए एक नियम तय करने को कहा है। 

विलासी जीवन मिलने के बाद जनता से कट जाने के कारण ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार खिसका था। लेकिन क्या आज दलितों के स्वाभाविक नेतृत्व का दावा करने वाले उसी जीवन शैली में नहीं चले गए हैं? क्या उनमें कांशीराम की तरह साइकिल यात्रा का साहस बचा है? सवाल सिर्फ दो पार्टियों के बीच वोट बैंक को लेकर चलने वाली डाह का ही नहीं है। सवाल उससे भी बड़ा यह है कि आज भी क्यों दलित गरीब बने हुए हैं और अलगाव से व्यथित होकर उग्रवादी बन रहे हैं? जाहिर है, उन्हें ऊपर उठाने के अब तक के प्रयास अधूरे रहे हैं और उसमें किसी एक को नहीं, सभी को मिल कर योगदान देना चाहिए।

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