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नहीं मिल रहा छह अरब रुपये का हिसाब

पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों में छह अरब से अधिक रुपये का हिसाब नहीं मिल रहा है। एक काम का दो बार भुगतान! नरेगा में एक ही समय पर मजूदर से चार स्थानों पर काम! रिटायरमेन्ट की उम्र सीमा पार करने के बाद भी कर्मचारी को जारी रहा वेतन भुगतान! किसी योजना की राशि कहीं और खर्च! टैक्स की रकम कर संग्राहक की जेब में! प्रधान महालेखा परीक्षक (पीएजी) ने मार्च, 08 तक की ऑडिट रिपोर्ट में पंचायती राज संस्थाओं में खर्च की गयी राशि में भारी गोलमाल का खुलासा किया है। बुधवार को पीएजी ए.के.सिंह और स्थानीय लेखा परीक्षक डी. जयशंकर ने वार्षिक रिपोर्ट जारी की। 

पीएजी ने पंचायत समितियों को प्रखंड कार्यालयों से नियंत्रण से अलग करने, ग्राम पंचायतों द्वारा वसूले जाने वाले टैक्स की दर तय करने, नया एकाउंट कानून बनाने, पंचायती राज विभाग के माध्यम से अनुदान देने, वित्तीय प्रबंधन सुधारने के लिए पंचायती संस्थाओं में बड़े पैमाने पर योजना-एकाउंट के जानकार कर्मियों की तैनाती और पंचायतों व शहरी निकायों के लिए दो उच्चस्तरीय कमेटी बनाने के सुझाव दिये हैं।   

पीएजी ने साफ तौर पर कहा कि अनुदान राशि का सही उपयोग नहीं होने से बड़े पैमाने पर राजस्व की क्षति हुई है। शहरी निकायों में 332.62 करोड़ रुपये और पंचायत संस्थाओं में 241.54 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं मिला। क्लोरीनेटर की खरीद, नगर निगम के कंप्यूटरीकरण, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेन्ट पर पटना और मुजफ्फरपुर नगर निगम ने 4.29 करोड़ रुपये बर्बाद किये। 23 जिला परिषदों ने संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना में एससी-एसटी के लिए मिले 18.67 करोड़ रुपये दूसरे कार्यो पर खर्च कर दिये।

‘अधिकतर संस्थाओं के पास एकाउंट बुक तक नही है। पता नहीं चलता कि विकास राशि कहां गयी? यह सरासर सरकारी धन की लूट का मामला है। नरेगा की हालत तो और भी खराब है। मजदूरों को एक ही समय में दो-दो या चार-चार जगहों पर काम करते दिखाया गया। पंचायती संस्थाओं के कामकाज की मॉनिटरिंग नहीं हुई। इसके लिए सीधे तौर पर राज्य सरकार जिम्मेदार है’- पीएजी ए.के.सिंह

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