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स्त्री विमर्श और गांधी के सच

स्त्री विमर्श और गांधी के सच

गांधी जयंती के शुभ अवसर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘स्त्री" विमर्श और गांधी का सच’ व्याख्यान का आयोजन किया गया, जिसकी मुख्य अतिथि सेंटर फॉर सोशल साइंस की अध्यक्ष डॉ. रंजना कुमारी थीं। इसके अलावा गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा भट्ट और सुरेंद्र जी ने सभा को सम्बोधित किया। छात्र जीवन से ही राजनीतिक और सामाजिक  गतिविधियों से जुड़ी रहीं डॉ. रंजना ने कहा कि उस समय समाज में औरतों के प्रति जो सोच थी, वह आज सुधारवाद के बीच दब कर रह गयी है। उन्होंने कहा कि समाज में आज औरतों के ऊपर अनेक किस्म के अत्याचार हो रहे हैं।  बाल विवाह, दहेज प्रथा, भ्रूण-हत्या, जन्म के बाद हत्या, असमानता  जसी बुराइयां आज भी समाज में मौजूद हैं। लेकिन जब गांधी जी से राजनीति में महिलाओं के सशक्तिकरण की बात हुई तो उन्होंने कहा कि मैं इसके साथ कोई समझोता नहीं कर सकता। महिलाओं को सशक्त बनाने की कोशिश ही उनके नारी आंदोलन का पहला आयाम था। उनका कहना था कि महिलाओं का अपने शरीर पर विवाह के बाद भी अपना पूर्ण अधिकार होता है। बिना उनके चाहे कोई उन्हें छू भी नहीं सकता- चाहे वह उनका पति ही क्यों न हो। डॉ. रंजना कुमारी ने कहा, गांधी जी ने अपनी किताब में स्पष्ट रूप से लिखा है कि महिलायें  हर तरह से स्वतंत्र हैं। उनका दूसरा आयाम था कि महिलाओं का उनकी सम्पत्ति पर पूरा हक है। उनकी सम्पत्ति किसी दूसरे के हाथों में नहीं जा सकती, बिना उनकी सहमति के।

डॉ. कुमारी ने कहा, उनका तीसरा आयाम महिलाओं की भागीदारी का था-चाहे सामाजिक स्तर पर हो या राजनीतिक स्तर पर। महिलाओं को उन्होंने कभी भी अलग से नहीं देखा। हमेशा एक व्यक्ति के रूप में देखा। उनका कहना था कि यह सामाजिक मसला है ना कि स्त्री, पुरुष के बीच का मसला। हमारे समाज में महिला, पुरुष के सामाजिक रिश्तों को लेकर हमें सामाजिक लड़ाई लड़नी है। महिलाओं के सामने ये चुनौतियां आज से नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही हैं। भारतीय गांधीवादी महिला आंदोलन अ¨हसा से जुड़ा था, क्योंकि गांधी जी का कहना था कि महिलायें तो अहिंसा की पुजरिन होती हैं। आज भी यह माना जता है कि नारीवाद पश्चिम की सभ्यता है, लेकिन यह गलत है। यह गांधी जी की विचारधारा से उत्पन्न हुआ था।

गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा भट्ट का कहना था कि यह सदी महिलाओं की सदी है, लेकिन अगर हम पहले जसी ही रहीं तो यह कैसे सिद्ध होगा। आज महिलाओं को 33% आरक्षण मिले या 100 फीसदी का, चाहे हम ग्राम प्रधान बन जायें, प्रधानमंत्री बन जाये या फिर राष्ट्रपति ही क्यों ना बन जायें,  फिर भी हमें यह सब आत्मशक्ति के बल पर ही करना होगा। हमें अपने अधिकारों के लिए सामने आना ही पड़ेगा। राधा भट्ट  ने कहा, स्त्री को दया की जरूरत नहीं, बल्कि समाज में समानता की जरूरत है और हमारा समाज अहिंसा से भरा होगा, तभी तो आने वाली सदी संवेदना की छवि होगी। आज गांधी जयंती पर हमें कसम खानी चाहिए कि औरत और मर्द के बीच इस भेदभाव को खत्म कर देंगे। तभी तो इससे हमारा समाज बदलेगा, दुनिया बदलेगी और परिवार बदलेगा।   

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