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गलतबयानी की एक कहानी यह भी

इधर (धर्मवीर) भारती जी के निजी जीवन तथा कार्यालयीन व्यवहार को लेकर निहायत बेतुकी और विद्वेषपूर्ण बातें आत्मकथा लेखन के बहाने से लिखी गई हैं। वैसी बातों पर प्रतिक्रिया प्रकट करके मैं भी उन्हीं पाठकों के लिए कुछ परोसूंगी, जो साहित्य से भी चटखारेदार स्वाद पाने को लपलपाते रहते हैं। प्रतिष्ठित व्यक्तियों के निजी जीवन पर किए गए इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप न तो साहित्य का विषय होते हैं, न ही इस तरह के लेखन या पठन-पाठन से किसी की रुचि परिष्कृत या समृद्ध होती है। न ही किसी को कोई साहित्यिक आनंद मिलता है। वैसे साहित्य में ऐसे लेखन की पड़ताल यदाकदा खुद-ब-खुद हो जाती है। उनके संगी-साथी ही ललकार दे देते हैं। ‘अपने अन्य साथियों से अपनी तुलना करके पछताइए और दांत किटकिटाइए, नाखून चलाइए।’

नया ज्ञानोदय में विजय मोहन की एक टिप्पणी छपी थी- ‘जिन्हें लगता है हमें साहित्य में वह जगह नहीं मिल सकी जिसके वे हकदार थे, ऐसे मीडियाकर लेखक आत्मकथा लिखने के नाम पर मरने के बाद ही नहीं, जीते जी बड़ी शख्सियतों को कीचड़ में लिथड़ाकर पेश कर रहे हैं और अपनी छवि को लॉन्ड्री से लाकर कलफ लगाकर पेश कर रहे हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘संस्मरण लेखन के नाम पर हिंदी में ओछी मनोवृत्तियों का बोलबाला है। हिन्दी का यह लेखन या ऐसा लेखक मनोवैज्ञानिक स्तर पर कहीं हीनता की ग्रंथि से भी पीड़ित है।’

खैर ऐसे कुंठाग्रस्त मीडियाकर लेखक तो सड़ी-गली सीवर की तरह होते हैं, जिन्हें इतिहास बुहारकर फेंक देता है, उनकी बात को क्या तवज्जो देना। पर जो सचमुच प्रतिष्ठित लेखक होते हुए भी आधी-अधूरी सुनी-सुनाई जानकारी के आधार पर बयानबाजी करते हैं, मानो साहित्य और राजनीति की गहरी समझ रखनेवाले पारखी चिंतक और मनीषी हैं। तब स्थिति सचमुच चिंताजनक होती है। मैं ध्यान दिलाना चाहती हूं, मन्नू भंडारी द्वारा लिखित आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ में भारती जी विषयक टिप्पणी की ओर।

यह भी जानती हूं कि साहित्य की समझ रखनेवालों ने उनकी उक्त टिप्पणी पर कुछ ध्यान ही नहीं दिया, अन्यथा कम-से-कम भारती जी के विरोधी तो उसका उपयोग कर ही डालते। मैं भी उस टिप्पणी को टाल जाती। पर जब ज्ञात हुआ कि ये पुस्तक कहीं पाठय़पुस्तक के रूप में स्वीकृत हो गई है तो यह जरूरी समझा कि मन्नू जी के ध्यान में यह बात ले आऊं कि उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह गलत तथ्यों पर आधारित है। इसलिए ध्यान देना होगा कि कच्ची उम्र और अपरिपक्व समझ के विद्यार्थियों तक गलत संदेश न पहुंचे।

मन्नू जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ‘इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल घोषित किए जाने के बाद रघुवीर सहाय ने सरकार के सामने सबसे पहले घुटने टेक दिए।’ और उसी क्रम में मन्नू जी को आश्चर्य हुआ कि ‘मुनादी’ के कवि ने ‘सूर्य के अंश’ कविता लिखी और बेहिचक हिमाकत कर बैठीं यह लिखने की कि भारती जी ने किसी के आग्रह, दबाव या किसी प्रलोभन के चलते वैसा काम किया। अध्यापिका रही मन्नू जी ने कविता की व्याख्या करते हुए लिखा कि चूंकि शीर्षक सूर्य ‘का’ नहीं सूर्य ‘के’ अंश है, बहुवचन है, यानी इंदिरा और संजय गांधी की प्रशंसा में लिखी गई कविता है। 

कविता का भावार्थ भी उन्होंने लिखा और लिखा कि अब जब इस विषय में लिखने बैठीं तो चूंकि ऐसी बातें पूरी प्रामाणिकता के साथ लिखनी चाहिए, इसलिए उन्होंने कई लोगों से पूछा पर उन्हें आश्चर्य हुआ कि किसी को इस कविता के विषय में कुछ नहीं मालूम किसी ने नहीं कहा कि हां, सूर्य के अंश भारती जी की लिखी कविता है। तब भी मन्नू जी नहीं सोच पाईं कि हो सकता है कि यह कविता भारती ने लिखी ही न हो। वैसे मन्नू जी के लिखे अनुसार उन्हें यह जानकारी भी थी कि भारती जी के नाम यह कविता न तो भारती जी के किसी संकलन में है, न उनके नाम से किसी पत्रिका में छपी है।

जानकारी के बावजूद मन्नू जी ने यह नहीं सोचा कि उन्होंने ऐसी कविता लिखी ही नहीं होगी और खुद ही अपने दिमाग को समझा लिया ‘हो सकता है, इसे लेकर उस समय उन्हें भी संकोच रहा होगा’ मुश्किल यह थी कि भारती पर जो आरोप लगाना चाहती थीं, उसकी प्रामाणिकता की पुष्टि कहीं से हो नहीं पा रही थी तो उन्हीं के अनुसार ‘आखिर इस संकट से भी पंकज बिष्ट ने ही उबारा।’ मन्नू जी को बताया गया कि भोपाल के किन्हीं मनोहर आशीष ने आपातकाल के समर्थन में एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई थी- सूर्य के अंश।

उसकी काव्यात्मक कमेंट्री लिखते हुए भारती जी ने उक्त कविता लिखी थी। फिर भी मन्नू जी ने एकबार भी नहीं सोचा कि धर्मयुग जैसी बड़ी पत्रिका के संपादन में अहर्निश खपे रहनेवाले भारती जी को यदि थोड़ा-सा भी अतिरिक्त समय खुद के लिए मयस्सर होता तो ‘बंद गली का आखिरी मकान’ उनकी अंतिम कहानी बनकर न रह जाती। समय मिलता तो उनके जैसा लेखक क्या किसी फिल्म की कमेंट्री लिखने जैसा साधारण-सा काम करता? नहीं मन्नू जी को यह तो समझना ही नहीं था। मन्नू जी ने अपने लिए तो यह लिखा ‘हमारी कलम से जो भी शब्द निकलते हैं, विशेषकर सृजन के संदर्भ में उनके पीछे हमारे विचार हमारे विश्वास, हमारी आस्था, हमारे मूल्य.. कितना कुछ तो निहित रहता है.. और मन्नू जी ने भारती जी के सृजन, विचार, विश्वास, आस्था और मूल्यों पर बेहिचक प्रश्नचिह्न् लगा दिए।’

मैंने जब उन्हें तथ्यों की जानकारी दी और उक्त फिल्म के निर्माता और निर्देशक मनोहर आशी ने स्वयं उन्हें पत्र लिखकर मन्नू जी को बताया कि यह फिल्म न तो आपातकाल के समर्थन में है न विरोध में, यह तो एक प्रेरणादायी फिल्म है तथा भारती जी ने उनकी इस फिल्म की कमेंट्री की कोई कमेंट्री कभी नहीं लिखी थी। तो वे हुज्जत करने लगीं कि ‘फिल्म लाकर दिखाओ’- मनोहर आशी जैसे बहुआयामी प्रतिभासंपन्न, प्रतिष्ठित और स्थापित व्यक्तित्व का कथन भी उन्हें झूठा लगा।

यह जानकर पाठक स्वयं आश्चर्य करेंगे कि जिस कविता को आधार बनाकर मन्नू जी भारती जी को सिद्धांतविहीन, चाटुकार सिद्ध कर रही हैं, वह कविता भारती जी की लिखी हुई है ही नहीं और मजे की बात यह कि उस कविता का आपातकाल और इंदिरा गांधी और संजय गांधी से संबंध स्थापित करनेवाली बुद्धि पर सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है, क्योंकि हकीकत यह है कि यह कविता एक ग्रीक कवि की लिखी हुई थी, जिसका एक अंश 1952 में छपे अपने उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ के प्रारंभिक पृष्ठ पर भारती जी ने उद्धृत किया था।

लेखिका हिंदी साहित्यकार हैं

 

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