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ब्लॉग वार्ता : इमारतों की इबारतों का कथाकार

गगनचुंबी इमारतों के दौर से पहले शहरों की पहचान उन इमारतों से होती थी, जो एक मंजिल की थी या फिर ज्यादा से ज्यादा दो मंजिला। अंग्रेजो के बनाए बंगले और सर्किट हाउस तो हर शहर की पहचान रहे हैं। लाल और पीले रंग के मकान। ये बंगले काफी खुले जगह में बने हुए हैं। यह खुलापन उसकी भव्यता को ताकत प्रदान करता है। धीरे-धीरे शहर बड़े होते गए, आस-पास कंक्रीट के जंगल खड़े हुए और ये इमारतें अपनी महत्व को लिये किसी कोने में दुबक गईं।

पटना का म्यूजियम, पुराना सचिवालय, इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर तमाम शहरों में बने सिविल लाइन्स। दिल्ली विधानसभा की अपनी ही खूबसूरती और सादगी है। शहरों में बने पुराने गेस्ट हाउस। दोनों तरफ पेड़, लाल छाई से बिछी सड़क, पोर्टिको और बरामदा। बरामदे में रखी बेंत की कुर्सियां। अब बहुमंजिला इमारतें जंगल की तरह लगती हैं। साल दो साल में उनकी चमक गायब हो जाती है और लाल-पीले रंग बदरंग लगने लगते हैं। हाउसिंग सोसायटी के इस काल में इमारतें पहचान के लिए नहीं हैं। स्टेटस के प्रतीक भी तो बदल गए हैं।

इन्हीं सब को बताने के लिए एक ब्लॉग आया है- प्रॉपर्टी संसार। मुकेश कुमार झा के इस ब्लॉग के लिए क्लिक कीजिए http:// propertysansar. blogspot. com । मुकेश कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल ले चलते हैं। बताते हैं इसका किस्सा। मुगल शैली में बनी गुम्बदें और यूरोपीय पुनर्जागरण काल की शैलियों की छाप से बनी ये सफेद इमारत। 1906 में बननी शुरू हुई ये इमारत और 1921 तक बनती रही। महारानी विक्टोरिया की ताकत का प्रदर्शन करने के लिए।

वायसराय लॉर्ड कर्जन के काल में बनी इस इमारत के वास्तुकार थे, सर विलियम एमर्सन। मुकेश बताते हैं कि किस तरह विक्टोरिया मेमोरियल को बनाने में इतालवी, मुगल और अन्य शैलियों को लेकर कशमकश चलती रही। वास्तुकार अपनी तरह से बनाना चाहते थे और कर्जन अपनी तरह से। कोलकाता में बंगाल नागपुर रेलवे का मुख्यालय गार्डन रिच भी देखने लायक है। मैं इसके कैम्पस में गया हूं। तब ये इमारत सौ साल की हो चुकी थी। सौ साल बाद भी ये कमरे बेहतरीन लगे। स्पेस का काफी ख्याल रखा गया है। गंगा नदी के किनारे गार्डन रिच क्लब अच्छा लगता है। गार्डन रिच के फ्लैट कबूतरखाने की तरह बन रहे हजार वर्गफुट वाले फ्लैट की तरह नहीं हैं। स्पेस का अंदाजा वर्गफुट से नहीं उसके खुलेपन से होता है। रेलवे का यह दफ्तर देखने लायक है।

मुकेश लिखते हैं कि प्रॉपर्टी एक ऐसा विषय है, जो जटिल होने के साथ-साथ ज्यादातर बातें अंग्रेजी में होने के कारण समाज का एक बड़ा तबका इस दुनिया के बारे में कम जान पाता है। ब्लॉग बनाने का मेरा एक ही उद्देश्य है कि प्रॉपर्टी संसार के बारे में आम लोग ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त कर सकें।दिल्ली की पुरानी छवि ब्रिटिश और मुगलकालीन इमारतों से है।

नई इमारतों से किस दिल्ली का नक्शा उभरता है, कहना मुश्किल है। दिल्ली बदशक्ल हो गई है। कपार के ऊपर से मेट्रो, बाल के ऊपर से फ्लाईओवर, दुकान में बदल चुके मकान से चुभती आंखें और कॉलोनियों में लगे लोहे के दरवाजे। जिसके ऊपर कबाड़ीवालों और सेल्समैन को न आने की चेतावनी लिखी होती है। मुकेश भारत की इमारतों के साथ दुनिया भर की इमारतों तक भी ले जाते हैं। अमेरिका के मिसौरी राज्य की पब्लिक लाइब्रेरी देखने लायक है। ब्लॉग पर इसका चित्र भी है। 

पूरी इमारत किताब की शक्ल में है। लगता है किसी ने किताबों को सजा कर रखा हो। मेरे ख्याल से आजाद हिंदुस्तान में अब लाइब्रेरी नहीं बनती। शिमला जायें तो माल पर एक खूबसूरत सी लाइब्रेरी मिलेगी। पटना का सिन्हा लाइब्रेरी या फिर तीनमूर्ति लाइब्रेरी भी कम भव्य नहीं है। कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी का तो अब जिक्र ही नहीं होता।

प्रॉपर्टी संसार में कैलीफोर्निया स्थित गूगल के दफ्तर की जानकारी दी गई है। 26 एकड़ में बने गूगलप्लेक्स में 11 कैफेटेरिया हैं। यहां दिन में तीन बार मुफ्त में खाना मिलता है। काम करते-करते थक जायें तो दफ्तर में ही सोने के इंतजाम है। हिंदुस्तान के दफ्तरों में लोग पहरा देते हैं कि कहीं कोई झपकी तो नहीं ले रहा।

मैं आपको और दुखी नहीं करना चाहता। जैसा दफ्तर मिला है, उसी से काम चलाइये। पान की पीक से बचने के लिए तमाम दफ्तरों के बरामदे, सीढ़ियों के कोने में देवी-देवता बिठाये गए हैं। रिश्वत न लेने के बाद सबसे अधिक चेतावनी इसी की होती है - कृपया यहां न थूकें। यहां पेशाब न करें की चेतावनी के बोर्ड पूरे भारत में अरबों की संख्या में लगे हैं। मुकेश कुमार झा का यह ब्लॉग नया है, मगर दिलचस्प दिशा में जाता दिखता है।


ravish @ndtv. com
लेखक का ब्लॉग है naisadak. blogspot. com

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