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करवाचौथ

हमारे यहां व्रत-त्योहारों में उपवास पर विशेष जोर दिया जाता है। अधिकतर व्रत में उपवास आवश्यक है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष चतुर्थी को सुहागनें दिनभर का उपवास करती हैं। चाँद को भरी करवी चढ़ाकर ही भोजन ग्रहण किया जाता है।

यूँ तो स्त्री-पुरुष दोनों के द्वारा विभिन्न व्रतों पर अलग-अलग या साथ-साथ रखा जाता है, परंतु कुछ व्रत हैं, जो स्त्री द्वारा ही रखे जाते हैं। जैसे अहोई अष्टमी (संतान के लिए), हरितालिका, करवा चौथ (पति के लिए)। व्रत पर विचार से ऐसा लगता है कि जब पति-पत्नी बराबर हैं, दोनों का सुख-दु:ख एक है तो पत्नी ही क्यों व्रत करे? पति क्यों नहीं? विवाह से दोनों एक हो जाते हैं। दोनों का सुख-दु:ख, हानि-लाभ एक। क्योंकि वे दाम्पत्य सूत्र में बंध जाते हैं। ‘दाम्पत्य’ शब्द एकवचन है। 

इसलिए दोनों के व्यक्तित्व अलग-अलग होते हैं, पर उनका हित-अनहित एक हो जाता है। हिन्दू रीति पर गहराई से विचार करें तो विवाह स्त्री के लिए ही होता है। उसी के पिता के घर में विवाह संपन्न होना, पति से सात वचन लेकर ही उसके वाम भाग में उसका बैठना, पति द्वारा उसके अंगुष्ठ की पूजा जैसी अनेक रस्में होती हैं, जिनमें वधू की ही प्रधानता होती है। इस विवाह संस्कार में पत्नी ही प्रमुख है।

विवाह के बाद पति का दीर्घायु होना पत्नी का सुहाग बढ़ाता है-
‘अचल रहे अहिवात तुम्हारा
जब लगि गंग यमुन जलधारा।’
कौशल्या द्वारा सीता को दिया गया यह आशीष, राम पर फलित होता है। सीता प्रसन्न हो जाती हैं। आशीष उन्हीं के लिए है।

व्रत-उपवास से स्त्रियों की संकल्प शक्ति भी जगती है। करवा चौथ के दिन सास को वायना देकर आशीष लेना भी पीढ़ियों को जोड़ता है। आज व्रतों के अंदर छुपी भावनाएं समाप्त होने लगी हैं। बाजारवाद का आडंबर बढ़ता जा रहा है। आस्थाएं कम हो रही हैं। व्रत पूर्ण आस्था से ही होना चाहिए। पति के दीर्घायु होने की अंत:कामना से व्रत करना, स्त्री को बहुत ऊँचा उठाता है।

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