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दाल का निकला दम

जिले में  करीब 5784 हेक्टअर में दाल का उत्पादन किया जाता है और औसतन 5000 मैट्रिक टन दाल का उत्पादन होता है, लेकिन इस बार 40 फीसदी उत्पादन सूखे की भेट चढ़ गया है। पिछले साल 4860 मैट्रिक टन दाल हुई थी, इस बार उत्पादन घटकर आधा रह गया है। सीमांत जिले में राजमा, गहत, अरहर, उड़द, चना, मसूर, मटर, सोयाबीन आदि दालें प्रचुर मात्र में उत्पादित की जाती है। अपने लिए रखने के साथ ही ग्रामीण दालों को मंडियों तक पहुंचाकर लाभ कमाते हैं।

मातली, चिन्यालीसौड़ व पुरोला में पहाड़ी अरहर का अपना खास स्थान है। गहत व सोयाबीन की दालें जनपद के सभी क्षेत्रों में होती हैं। विभागीय अनुमान के मुताबिक जिले में लगभग 1 करोड़ से अधिक बजट की दालें दूसरी फसलों के साथ पैदा की जाती हैं। इस बार बुवाई के दौरान जमीन की नमी गायब होने से काश्तकारों ने दालों की बुवाई तो की, लेकिन सूखे के चलते उत्पादन, गुणवत्ता व आकार में सीधा प्रभाव पड़ा है। 

अक्टूबर माह तक खेतों में धान, आलू, व अन्य पारंपरिक फसलें निकलने के साथ-साथ दालें भी तैयार हो जाती हैं, किन्तु इस बार मौसम की मार से दाल के खेत में घास नजर आ रहा है। हालांकि अन्य नकदी फसलों की अपेक्षा दालें हार्ड क्रोप हैं, लेकिन बुवाई के दौरान बारिश न होने से उत्पादन पर असर पड़ा है। डुण्डा, भटवाड़ी, चिन्यालीसौड़, बड़कोट, नौगांव, पुरोला व मोरी में दालों पर मौसम की मार से अब काश्तकारों को चमकीली दालें ही 80 से 100 रुपये तक खरीदनी पड़ रही है।

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