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माओवादी बर्बरता

‘पूंजीवादी समाज के सामने यह दुविधा रहती है कि या तो वह समाजवाद की तरफ जाए या बर्बरता की तरफ।’ साम्यवादी विचारकफ्रेडरिक एंगिल्स का यह चर्चित कथन आज भारत के माओवादी आंदोलन पर हूबहू लागू हो रहा है। समाजवाद की तरफ बढ़ पाने में असमर्थ नक्सलवादी वह कर रहे हैं, जो अलकायदा या तालिबान के आतंकवादी करते हैं। झारखंड में पुलिस इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदुवर को अगवा करने के बाद उनकी सिर काट कर हत्या, किसी भी क्रांतिकारी आंदोलन पर एक बदनुमा दाग है।

इसे वे अपनी सांगठनिक क्षमता से कितना भी जोड़ें, पर इससे वे शहरी समाज में बची खुची सहानुभूति भी खो देंगे। जिस कोबाद गांधी को सरकार के कब्जे से छुड़ाने के लिए माओवादियों ने यह हरकत की है उन्होंने शायद ही जीवन में ऐसा कोई कार्य किया होगा। लेकिन इस तरह की क्रूर हत्याओँ की परंपरा माओवादी आंदोलन में रही है और वे जंगलों व गांवों में लगाई जाने वाली अपनी जनअदालतों में तथाकथित वर्ग शत्रु को छह इंच छोटा करने की ऐसी सजाएं देते रहे हैं। इंस्पेक्टर फ्रांसिस की हत्या के कुछ खास अर्थ हैं। यह हत्या दिल्ली और पश्चिम बंगाल में पकड़े गए दो नेताओं को छुड़ाने के लिए झारखंड में की गई है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि नक्सलियों का संगठन भले ही ग्रामीण हो, पर वह अखिल भारतीय स्तर एकजुट है। वह किसी राज्य और इलाके का बदला कहीं भी ले सकता है।
  
नक्सली आंदोलन के विश्लेषक अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि वे वैचारिक मतभेदों और जातिवादी आग्रहों के कारण विभिन्न गुटों में बंटे हैं, इसलिए उनकी लड़ाई आपस में ही चलती रहेगी। लेकिन यह आकलन अब सही नहीं है। पीपुल्स वार ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी ) के कुछ साल पहले एकजुट होने के बाद उनकी गुटबाजी एकता में बदल गई है।

दूसरी बात यह है कि पीडब्ल्यूजी से विलय के बाद एमसीसी की जो क्रूरता पिछले कुछ सालों से रुकी हुई थी, वह फिर सिर उठाने लगी है। दूसरी तरफ नक्सलियों के अर्थतंत्र के बारे में यह दावा भी ठीक ही लगता है कि लाल गलियारे में ठेकेदारों और पूंजीपतियों से वसूली के बहाने उनका 1,500 करोड़ रुपए का साम्राज्य चल रहा है। जाहिर है छापामार युद्ध चला रहे नक्सलियों से एक तरफ सुरक्षा बलों को मोर्चा लेना होगा तो दूसरी तरफ इसके खिलाफ प्रचार युद्ध नहीं, बल्कि गांधी और अंबेडकर से जुड़े मध्यमार्गी राजनीतिक विचारों को भी लड़ाई में उतारना होगा।

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