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फिक्सिंग का जिन्न

क्रिकेट में भारत और पाकिस्तान जब भी हारते हैं, तो उनके देशों में उसे हजम करना मुश्किल होता है। क्रिकेट को लेकर अतियों के शिकार इन देशों में वाह-वाह और हाय-हाय के बीच कुछ नहीं होता। पाकिस्तान का तो और भी बुरा हाल है। वहां हर हार पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगा दिया जाता है। हाल ही में श्रीलंका में पाकिस्तान जब हारा, तो फिक्सिंग का आरोप लगा था। अब चैंपियंस ट्रॉफी की हार पर लग गया है। यह नहीं कह सकते कि फिक्सिंग होती ही नहीं। लेकिन कुछ फर्क हमें समझने चाहिए।

सट्टेबाजी एक चीज है। मैच फिक्सिंग बिल्कुल दूसरी। मैच की सूचनाएं देना एक बात है और मैच लुटा देना दूसरी बात। सट्टा, जुआ और मैच फिक्सिंग में बहुत फर्क है। मैच फिक्सिंग बहुत बड़ा आरोप है। देश से जुड़ने के बाद तो वह और भी भयानक हो जाता है। अब तक का अनुभव यही बताता है कि मैच फिक्सिंग के आरोप खटाखट लगा दिए जाते हैं। लेकिन दुनिया का कोई क्रिकेट बोर्ड उसके ट्रायल को गंभीरता से नहीं लेता। बस जितनी तेजी से आरोप लगते हैं। उतनी ही तेजी से मामला उड़ा दिया जाता है। शायद इसीलिए आज तक एक भी खिलाड़ी को कायदे की सजा नहीं मिली है। सजा तो तब मिलेगी, जब ट्रायल गंभीरता से होगा।

एक हैंसी क्रोन्ये को सजा मिली। लेकिन वह सजा उनके इकबालिया बयान से निकल कर आई थी। नहीं तो, दक्षिण अफ्रीकी बोर्ड पूरी तरह उनके बचाव में लगा था। वेस्टइंडीज में 2007 के पिछले वर्ल्ड कप में पाकिस्तानी कोच बॉब वूल्मर की हत्या हो गई थी। कहते हैं कि उनकी हत्या इसलिए हुई थी क्योंकि उन्हें फिक्सिंग की जानकारी हो गई थी।

फिक्सिंग की तोहमत और एक कोच की हत्या के बाद भी पाकिस्तान ने उस सच को सामने लाने के लिए कोई बड़ी कोशिश नहीं की। और न ही दुनिया में क्रिकेट को चलानेवाली आईसीसी ने कुछ किया। चैंपियंस ट्रॉफी में पाकिस्तान की हार के बाद वहां जो भी हंगामा हो रहा है, वह संसदीय समिति या कहिए नेताओं की नाटकबाजी है। बेहतर हो कि इन सब नाटकों की जगह कायदे से मामले की जांच कराई जाए। अगर ठीक से जांच नहीं होती है, तो आईसीसी उसमें हस्तक्षेप करे। ताकि खेल और देश को अगर किसी ने दागदार करने की कोशिश की है, तो उसे सजा मिले। खेल के मैदानों का साफ सुथरा रहना बेहद जरूरी है। 

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