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झोले में है विद्यालय का दफ्तर

अगर आपको लगता है कि आपके बच्चे सिर्फ एयरकूल्ड कक्षाओं में ही पढ़ सकते हैं तो एक बार आपको बड़ागांव जरूर घूम आना चाहिए। बड़ागांव ब्लाक के जौनपुर सीमा के नजदीक स्थित असवारी गांव में अभी भी बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ाई करते हैं। वाहनों से उड़ने वाली धूल के बीच पढ़ते बच्चे बरबस ही सबका ध्यान आकर्षित करते हैं। यहां कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई होती है। 166 बच्चे इस विद्यालय में पढ़ते हैं।

कक्षा एक में 28, दो में 29, तीन में 33, चार में  42 और पांच में 38 बच्चे हैं। प्रधानाध्यापक सहित चार शिक्षक यहां पठन-पाठन कराते हैं। विद्यालय का कार्यालय प्रधानाध्यापक के झेले में चलता है। विद्यालय के थोड़े-बहुत जो सामान हैं, आसपास के दुकानों और झोपड़ियों में रखे गए हैं। तेजी बारिश या आंधी में स्कूल बंद हो जाता है। बच्चे व शिक्षक पेड़ के नीचे खड़े होकर बारिश बंद होने की प्रतीक्षा करते हैं। जाड़े में कोहरा पड़े या गर्मी तेज धूप, मुसीबत झेलना बच्चों की नियति बन गई है।

आसपास के लोगों के मुताबिक यह विद्यालय सन 2000 से चल रहा है। गांव वालों ने बच्चों को पढ़ाने के लिए भूमि का एक टुकड़ा मुहैया कराया है। वे बीच-बीच में स्कूल बंद करने की धमकी देते हैं। उन्हें लगता है कि स्कूल इसी तरह चलता रहा तो जमीन सरकारी हो जाएगी। ऐसा नहीं है कि स्कूल के लिए भवन बनाने के प्रयास नहीं हुए। पास में सड़क पार स्कूल का अद्धनिर्मित भवन विवादों में फंस गया।

भवन निर्माण पर स्टे लग गया। इस भवन का शिलान्यास 9 सितंबर 1999 को तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष संकठा पटेल ने किया था। विभागीय अधिकारियों की उदासीनता से आज तक मुकदमेबाजी का अड़ंगा दूर नहीं हो सका है। प्रधानाध्यापक राममुनि राम का कहना है कि जो सुविधाएं मौजूद हैं, उसी में पढ़ाई करा रहे हैं। करें तो क्या करे?

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