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अचानक नहीं खड़ी होती है कोई रुखसाना

सामान्य स्थिति में किसी महिला का जिक्र आते ही उपलब्धि नहीं, अक्सर अत्याचार की आशंका सिर उठाती है। दहेज, बलात्कार, भेदभाव, कन्या भ्रूण हत्या, यौन शोषण, हिंसा, प्रताड़ना जैसे मुद्दे औरतों के साथ चस्पा हैं, इसलिए रुखसाना कौसर जैसी मामूली लड़की की बहादुरी का किस्सा चौंकाता है। आत्मरक्षा के लिए उसने एक आतंकवादी को मार गिराया। रुखसाना का रौद्र रूप देखकर बाकी हमलावर जान बचाकर भाग निकले। आज पूरा देश उसकी आरती उतार रहा है।

निश्चय ही रुखसाना की कहानी घाटी में बदलती हवा का प्रतीक है। अपने सम्मान, परिवार और रोजगार को बचाने के लिए कश्मीर की आवाम आतंकवादियों के खिलाफ खड़ी दिखती है। कहीं अकेले, कहीं एकजुट होकर। युद्ध, अकाल, बाढ़, सूखा और अशांति की सर्वाधिक मार महिलाओं पर पड़ती है। कश्मीर तथा उत्तर-पूर्व के अशांत इलाकों में आतंकवादियों और पुलिस-प्रशासन के अत्याचार के किस्से अक्सर सुनाई पड़ते हैं, जिनकी ज्यादातर शिकार महिलाएं ही होती हैं। अच्छी बात यह है कि अनाचार का मुखर विरोध होने लगा है। मणिपुर की महिलाएं सशस्त्र बलों के गैर-कानूनी करनामों के खिलाफ लंबे समय से एकजुट होकर लड़ाई लड़ रही हैं। रुखसाना ने कश्मीर में औरतों को संघर्ष की राह दिखाई है। इस प्रतिरोध को यदि संगठन की शक्ति मिल गई तो अत्याचारियों के लिए टिकना कठिन हो जाएगा।

यूं तो औरत पर थोपी गई हिंसा और प्रशंसा दोनों में पुरुष जाति का स्वार्थ होता है। यदि आज रुखसाना पर प्रशंसा के फूल बरस रहे हैं तो इसका एक कारण सामंती मूल्यों में जकड़े पुरुषों का यह आभास है कि आतंकवाद या सशस्त्र बलों के जुल्मों का सामना अकेले दम करना उनके वश की बात नहीं है। मतलब पड़ने पर पुरुष सदैव औरत का सहारा लेता है और काम निकलते ही उसे घर की चारदीवारी में लौट जाने का हुक्म सुना देता है। पुरुष अपनी सुविधा के मुताबिक ही महिलाओं की आजादी तय करता है।

बहुत पुरानी बातों पर न जाकर यदि पिछले सौ-डेढ़ सौ साल का इतिहास ही खंगाला जाए तो औरतों की बहादुरी के सैकड़ों किस्से सुनाए जा सकते हैं। 1757 से 1856 तक अंग्रेजों के खिलाफ हुए सशस्त्र विद्रोहों में महिलाओं ने न केवल भाग लिया, बल्कि सफलतापूर्वक नेतृत्व भी किया। इनमें संन्यासी विद्रोह की नेता देवी चौधुरानी, चुआड़ विद्रोह की नेता रानी शिरोमणि, कित्तूर की वीर रानी चेनम्मा, शिवगंगा स्टेट की विद्रोही वीरांगना वेलुनाचियार के नाम प्रमुख हैं। 1857 में, जहां झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और लखनऊ की बेगम हजरत महल क्रांति का नेतृत्व कर रही थीं, वहीं नर्तकी अजीजन तथा कुमारी मैना जैसी किशोरियां भी पीछे नहीं थीं।

ब्रिटिश शासन के खिलाफ महात्मा गांधी के आह्वान पर हजारों महिलाएं कुर्बानी देने घर से निकली थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बंगाल की ननी बाला देवी को पुलिस ने तीन दिन तक न केवल क्रूर यातनाएं दीं, नंगा कर इतना पीटा  कि वह अधमरी हो गईं। इस अत्याचार के बावजूद वह अंग्रेजों के खिलाफ आक्रोश उगलती रहीं। बंगाल के क्रांतिकारी नेता सूर्यसेन के छापामार दल की सदस्य 21 वर्षीय प्रीतलता वादेदार भारत की पहली क्रांतिकारी महिला शहीद हैं।

चटगांव शस्त्रगर कांड के बाद अपने साथियों की मौत का बदला लेने के लिए उन्होंने एक यूरोपीय क्लब पर हमला कर अंग्रेजों को मौत के घाट उतारने की योजना बनाई। उन्होंने क्लब की इमारत को बमों के धमाकों और पिस्तौल की गोलियों से हिला दिया। जवाब में चली एक गोली से वह घायल हो गईं। अंग्रेजों से बचने के लिए प्रीतलता ने पोटाशियम साइनाइड खाकर जान दे दी।

गवर्नर के बंगले में घुसकर उस पर गोली दागने वाली स्कूली छात्र शांति घोष और सुनीति चौधरी का किस्सा भी खूब मशहूर रहा है। इसी प्रकार सरला देवी चौधरी का क्रांति संगठन हो या कल्पना दत्त, बीना दास, उज्जवला मजूमदार जैसी क्रांतिकारी युवतियों की सीधी व छापामार लड़ाई, अरुणा आसफ अली का भूमिगत आंदोलन हो या उषा मेहता का भूमिगत रेडियो, इन सबने क्रांति यज्ञ में बढ़-चढ़कर आहुति दी थी। दुर्गा भाभी, सुशीला देवी, सुनीति देवी, मृणालिनी देवी, श्री देवी, प्रकाशवती, इंदुमती सिंह, सुहासिनी गांगुली जैसी सैकड़ों महिलाएं थीं जिन्होंने क्रान्तिकारी पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया।

अनगिनत कुर्बानियों और साहस व संघर्ष की लम्बी दास्तान के बावजूद औरतों की स्थिति में गुणात्मक बदलाव नहीं आया है। आज भी वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं। केवल नौकरी या मतदान के अधिकार के सहारे वे बराबरी का दर्जा नहीं पा सकतीं। रुखसाना के साहस को सलाम किया जाना चाहिए, किन्तु उसे महिमा मंडित कर मुख्य मुद्दे से भटकना समझदारी नहीं कही जाएगी। सुप्रसिद्ध फ्रांसिसी लेखिका सीमोन द बोवा का मत है कि स्त्री पैदा नहीं होती, उसे बना दिया जाता है।

इस बात को बर्नार्ड शॉ ने दूसरे अंदाज में समझाया है। बर्नार्ड के अनुसार गोरी चमड़ी वाले पहले तो नीग्रो को जूता पॉलिश के धंधे में धकेल देते हैं और फिर कहते हैं कि वे जूता पॉलिश के सिवाय कुछ नहीं कर सकते। औद्योगिक क्रांति से औरतों को उत्पादन के क्षेत्र में प्रवेश तो मिला और आर्थिक आजादी का द्वार भी खुला, किन्तु उनकी सामाजिक स्थिति में खास बदलाव नहीं आया है। उल्टे कामकाजी महिलाओं पर घर-बाहर के काम का दोहरा बोझ लाद दिया गया है। आर्थिक आजादी नहीं, राजनैतिक चेतना और सामूहिक संघर्ष से ही वे समाज में बराबरी का हक पा सकती हैं। व्यक्तिगत उपलब्धि के बजाए साझा शक्ति की समझ विकसित करने से ही बात बनेगी।

पुरुष समाज समझदार और साहसी औरत के मुकाबले एक चंचल, शोख, मासूम और समर्पित महिला को पसंद करता है। बुद्धि और साहस पर पुरुषों के एकाधिकार की मानसिकता ही रुखसाना जैसी लड़की के आत्मरक्षा में उठाए कदम को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है। कानूनन बराबरी का हक देने वाले लोग ही अक्सर स्त्री के सामने सामाजिक, नैतिक और लोक व्यवहार के अड़ंगे खड़े करते हैं। औरत के प्रति उपेक्षा और भेदभाव की ग्रंथि भारत ही नहीं पश्चिमी समाज में भी गहरी जड़ जमाए है। प्लेटो जैसा महान यूनानी दार्शनिक इसीलिए ईश्वर का आभारी था क्योंकि वह गुलाम या औरत बनकर नहीं जन्मा।

शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना ही हिंसा नहीं होती, लिंगभेद को बढ़ावा देना भी हिंसा की श्रेणी में आता है। कन्या भ्रूण हत्या के पाप से सने समाज में रुखसाना के साहस पर गला फाड़कर प्रशंसा करना दोगलापन   ही माना जाएगा। औरतों को बराबरी का दर्जा दान में नहीं मिल सकता, इसके लिए उन्हें और संगठित होकर संघर्ष करना  पड़ेगा। हमें इस लम्बी लड़ाई के लिए एक नहीं सैकड़ों
रुखसाना चाहिए।

लेखिका ‘हिन्दुस्तान’  में एसोशिएट एडिटर हैं

sushmavarma @ hindustantimes . com

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