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आंध्र प्रदेश : अपने पांव में कुल्हाड़ी मारता अभियान

पिछले हफ्ते जब आंध्र प्रदेश में वाई. एस. जगनमोहन रेड्डी के समर्थकों ने खम्माम जिले के पार्टी मुख्यालय पर संप्रग अध्यक्षा सोनिया गांधी का बैनर फाड़ दिया तो अपने पिता की विरासत संभालने की जगन की संभावनाएं शून्य हो गईं। जगन के पक्ष में अभियान चलाने वालों की समझ में भी यह बात आ गई थी, इसलिए उन्होंने मामले को दबाने की कोशिश की। यह उस समय हुआ, जब पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष डी. श्रीनिवास खम्माम जिले के पार्टी पदाधिकारियों के साथ सदस्यता अभियान के सिलसिले में टेलीकॉन्फ्रेंस कर रहे थे।

जगन समर्थकों के संगठन ‘जगन सेना’ ने उस वक्त जिला कार्यालय पर धावा बोला, तोड़-फोड़ की और पोस्टर बैनर वगैरह फाड़ दिए। लगभग उसी समय राजमुंदरी में कुछ समर्थकों ने राज्य परिवहन निगम की एक बस को जला दिया। ये लोग अमलापुरम  के सांसद के एक बयान पर भड़क उठे थे। सांसद ने कहा था कि लोगों को पद उनके अनुभव के आधार पर दिए जाते हैं और जो मंत्री जगन को मुख्यमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं उन्हें इस मांग से पहले रोसैय्या मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए।

जगन को मुख्यमंत्री बनाने की मांग तब से चल रही है, जब दिवंगत मुख्यमंत्री का शव हैदराबाद पंहुचा ही नहीं था। उनके अंतिम संस्कार से पहले ही सारी मशीनरी काम करने लग गई थी, राज्य भर से आत्महत्याएं करने की खबरें आने लग गई थीं। हर चाल इस तरह से चली जाने लगी थी कि जगन को अपने पिता का राजनैतिक वारिस स्वीकार कर लिया जाए।

लेकिन पूरी चतुराई से तैयार इस अभियान से कोई नतीजा नहीं निकल सका। इसके दो कारण हैं। एक तो यह कि पार्टी ने आला नेताओं के बच्चों के लिए एक तरह की प्रशिक्षण योजना जैसी बना रखी है। इसमें यह वादा है कि एक बार जब वे खुद को जमीनी स्तर पर साबित करेंगे, तभी उन्हें नेतृत्व की भूमिका दी जाएगी। सबसे अच्छा उदाहरण राहुल गांधी खुद हैं, जिन्हें केंद्र में मंत्री तक नहीं बनाया गया।

यह तो एक सामान्य नियम है, जो सभी पर लागू होता है लेकिन कई चीजें और हो गई जिससे जगन को नेता बनाया जाना और भी मुश्किल हो गया। जगन अभी पिछले आम चुनाव में ही राजनीति में आए हैं। उन्होंने कडप्पा सीट से चुनाव जीता, जो उनके पारिवारिक प्रभाव वाली सीट है। इसके पहले वे व्यापार कर रहे थे और यह सभी को पता है कि उनके पिता के मुख्यमंत्री बनने के पहले तक व्यापारिक क्षेत्रों में उनका कोई बहुत ज्यादा नाम नहीं था। पहले उनके पास तीन इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियां थीं, जो छह साल में बढ़कर 18 हो गई और माना जाता है कि सब कुछ उनके पिता की मेहरबानी से ही हुआ। राजनैतिक प्रतिद्वंदी तो इस बात के बाकायदा दस्तावेज तक पेश कर चुके हैं कि पिता के मुख्यमंत्री बनने के बाद जगन के कारोबार में किस तरह से संपन्नता आई।

कांग्रेस की धारणा यह थी कि उन्हें एकदम से मुख्यमंत्री बना देना बाद में पार्टी को परेशानी में डाल सकता है। इसके अलावा जिस तरह से सारा अभियान चलाया जा रहा था, उसने यह भी बता दिया कि राज्य में ऐसे कई निहित स्वार्थ हैं, जिनका हित जगन को मुख्यमंत्री बनाए जाने में ही है। फिर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने से यह संकेत भी जाता कि कांग्रेस एक लॉबी के दबाव के आगे झुक गई है। इस बीच खम्माम जिले में सोनिया गांधी की तस्वीर वाला बैनर फाड़ने से आला कमान की नाराजगी बढ़ गई है।

जगन और उनके संरक्षक के. वी. पी. रामचंद्र राव इसका अर्थ अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए बचाव में आ गए हैं। दोनों ने ही इस घटना की निंदा की और रामचंद्र राव तो निजी तौर पर माफी मागने के लिए तुरंत ही दिल्ली रवाना हो गए। जगन ने सार्वजनिक तौर पर पार्टी अध्यक्षा के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की और यहां तक कहा कि वह उन्हें अपनी मां की तरह मानता है। पर इससे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मौका मिल गया और वे इस हिंसा के खिलाफ खुलकर बोलने लग पड़े। यह अलग बात है कि इन सभी नेताओं को जगन खेमें से जान से मार दिए जाने की धमकी तक मिल चुकी है।

इन हालात में पार्टी आलाकमान नए मुख्यमंत्री के कामकाज को ध्यान से देख रहा है। आलाकमान चाहता है कि रोसैय्या स्थिरता लाएं, राजनैतिक हालात और प्रशासन को सामान्य बनाएं। अगर अगले कुछ सप्ताह में वे इन लक्ष्यों को हासिल करने में कामयाब रहते हैं तो आलाकमान उन्हें जगनमोहन के विकल्प के तौर पर देखने लगेगा। कई राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव जब पूरे होंगे तो आलकमान अपनी योजना को आगे बढ़ाएगा।

radhavishwanath73 @ yahoo. com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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