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गंगा का जीवन

देर से ही पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की पहली बैठक और उसके साथ काम शुरू होने की हलचल का स्वागत किया जाना चाहिए। सन् 2020 तक गंगा को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त कर देने के लक्ष्य पर विशेषज्ञों की रपट इस साल के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है। इसलिए काम पूरा करने के लिए दस साल का समय तय किया गया लगता है। इससे पहले भी 1985 से 2009 तक गंगा एक्शन प्लान के माध्यम से 50 करोड़ लोगों की जीवन रेखा समङी जाने वाली इस नदी को पुनर्जीवित करने का प्रयास हुआ पर वह विफल रहा।

सरकार विफलता की उन वजहों को ध्यान में रख कर चल रही है और इसीलिए गंगा को प्रदूषण मुक्त और जीवन युक्त बनाने के लिए बने इस प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र और संसाधन के दायरे को काफी बड़ा रखा गया है। इसमें उन सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को शामिल किया गया है, जिनसे होकर गंगा गुजरती है। इतना ही नहीं इनमें उन सभी नदियों की भी चिंता शामिल है, जो गंगा को सदानीरा बनाती हैं। इसके लिए 15,000 करोड़ रुपए का संसाधन जुटाने का लक्ष्य है, जो कि पिछली योजना के मुकाबले 15 गुना ज्यादा है। लेकिन गंगा को नया जीवन देने के मनमोहन सिंह के इस भगीरथ प्रयास में विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय क्षत्रपों की अपनी दिक्कतें हैं।
   
प्राधिकरण में शामिल पांचों राज्यों के मुख्यमंत्री यह तो चाहते हैं कि इस योजना की राशि का अधिकतम लाभ लेते हुए वे अपने शहरों के सीवर और औद्योगिक कचरे को साफ करने की समुचित व्यवस्था कर लें। इसमें शहरों का सीवर साफ करना तो विशेष रूप से जरूरी है, क्योंकि गंगा में 70 फीसदी प्रदूषण तट पर बसे उत्तरकाशी, हरिद्वार से लेकर कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना और कोलकाता जैसे शहरों के सीवर से और 30 फीसदी औद्योगिक कचरे से होता है।

इनमें कुछ सीवर व्यवस्थाएं इतनी पुरानी हैं कि वे आबादी के लिहाज से विशाल हो चुके शहर की गंदगी का भार उठा ही नहीं पा रही हैं। लेकिन असली चुनौती आधुनिक विकास करते हुए गंगा में पानी का न्यूनतम प्रवाह बनाए रखने की है। उसके बिना गंगा की जैविक व्यवस्था नहीं बच सकती। राज्यों का जोर गंगा के पानी  का बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए अधिकतम उपयोग करने पर है, जबकि पर्यावरणविद् विद्युत संयंत्रों की संख्या पर अंकुश चाहते हैं। विकास और गंगा के जीवन में यहीं पर संतुलन कायम करना आधुनिक भगीरथ की सबसे कठिन परीक्षा है।

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