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शराब और सलीका

एक ओर दिल्ली सरकार ने 83 नई शराब की दुकानें खोलने का फैसला किया है, दूसरी ओर दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने पर 50,000 रुपए जुर्माना और छह महीने तक जेल की सजा देने का कानून भी जल्दी ही बन जाएगा। ये दोनों चीजें विरोधाभासी लग सकती हैं, लेकिन हैं नहीं। शराबबंदी को अब कोई व्यावहारिक नीति नहीं मानता और शराब पीना समाज में भी काफी स्वीकार्य हो गया है। समाज में शराब का चलन तो बढ़ गया है, लेकिन उसका कायदा या तहजीब हमारे समाज में उतनी व्यापक नहीं है, जैसे सड़कों पर कारें तो बढ़ती ही जा रही हैं, लेकिन चलाने का सभ्य तरीका हमारे लोगों ने नहीं सीखा है।

उसी तरह लोग हमारे यहां शराब पीने को हर किस्म के सभ्य आचरण और नियमों-कायदों से मुक्ति के लाइसेंस की तरह देखते हैं, ऐसे में जरूरी है कि शांति और सुव्यवस्था की खातिर शराब से संबंधित कानून कड़े किए जाएं। शराब का प्रचलन बढ़ना अच्छा है या बुरा, इस बारे में अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन एक बात पर दो राय नहीं हो सकती कि शराब की वजह से दूसरों को तकलीफ नहीं होनी चाहिए। हमारे समाज में काफी वक्त तक शराब व्यापक रूप से स्वीकृत नशा नहीं था।

समाज के उच्च और निम्न वर्ग में इसका चलन था, या आदिवासी समाजों में यह प्रचलित थी, लेकिन सामाजिक आचार-विचार का निर्धारण करने वाले मध्य वर्ग में यह स्वीकृत नहीं थी, इसलिए शराब पीना सामाजिक आचार -विचार से विद्रोह का प्रतीक बन गई। अब तक कहीं न कहीं यह धारणा प्रचलित है, इसलिए शराब पीकर उत्पात मचाना बहुत आम है। चाहे शादी-ब्याह में सड़कों पर शराब पीना हो या नशे में धुत्त वाहन चलाना, ये सब इसी के प्रमाण हैं।  इसलिए जरूरी है कि अगर लोग शराब पीना ही चाहते हैं तो उसकी तहजीब सीखें।

दिल्ली में ही लगभग 12,000 दुर्घटनाएं हर साल होती हैं और उनमें से लगभग 8000 शराब पीकर वाहन चलाने से होती हैं और करीब 1500 लोग हर साल मरते हैं। इसके अलावा शराब पीकर होने वाले उत्पात जनजीवन को असुरक्षित और अराजक बनाते हैं। कानूनों के प्रति सम्मान हमारे समाज में वैसे ही कम हैं और शराब पीकर तो वह और भी कम हो जाता है। अगर सरकार इस उत्पात से निपटने के लिए कड़े कानून बनाती है और उन्हें सख्ती से लागू करती है तो इससे अच्छा क्या होगा।

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