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सादगी यात्रा में ही नहीं, सुरक्षा में भी हो

सादगी की मुहिम यदि नेता लोग अपनी सुरक्षा व्यवस्था में भी छेड़ें तो राजकोष में बचत अकूत होगी। यदि देश का गृहमंत्री अपनी आधी आस्तीनवाली कमीज के नीचे बुलेट प्रूफ सदरी के बिना, गार्ड के बिना, हैदराबाद के स्टेडियम में आम दर्शक दीर्घा से क्रिकेट मैच देख सकता है, तो उससे कमतर पदों पर विराजे लोगों की निजी सुरक्षा हेतु खजाने पर इतना बोझ क्यों पड़े? मान भी लें कि निर्वाचित लोकसेवक कोई नत्थू खैरे नहीं हैं। मगर यथार्थ यह भी है कि सवा अरब के देश में आधे से अधिक कंगाली में जी रहे हैं। इतनी विषमता विप्लव की वजह बन सकती है।

आखिर ये वीआईपी इन सशस्त्र काली वर्दीधारियों की दीवार से घिरे रहने में कौन सा नैसर्गिक आनन्द पाते हैं। यही प्रश्न गृहमंत्री पलनिअप्पन चिदम्बरम ने गत लोकसभा सत्र में उठाया था। कई वीवीआईपी को दी जानेवाली सुरक्षा में बचत का प्रस्ताव रखा था। तब यादवद्वय लालू प्रसाद तथा मुलायम सिंह के समर्थकों ने सदन में हंगामा बरपा था। सरकार घबरा गई। पुरानी व्यवस्था बरकरार रखी। एक मुद्दा सार्वजनिक तौर पर उठता है कि इन जननायकों को लाखों वोटरों का प्यार हासिल है। उनकी आवाज पर भीड़ सैलाब बन जाती है। इन महारथियों को पैदल चलता आमजन पलकों पर बिठाता है। तो फिर उन्हें खौफ काहे का? और यदि इतना डर तो राजनीति को तिलांजलि देकर दुकान खोल लें।

निर्वाचक और निर्वाचित के दरम्यान दूरी होनी नहीं चाहिए। यह फासला मनमोहक नहीं होता। कई बार सदन में ब्यौरा आ चुका है कि वीआईपी सुरक्षा पर इतने करोड़ खर्च हो चुके हैं। यह कितना ढोंगी है और कितना युक्तिसंगत है? इस सवाल पर देश जवाब चाहता है। यह बहस कटु होगी और तीव्रतर होगी, क्योंकि नगरों में छिने मंगलसूत्र पर रोती महिलायें, अपनों के अपहरण और फिरौती से तंग नागरिक, हत्या व बलात्कार से पीड़ित जन, जहरखुरानी के शिकार रेलयात्री और हजारों ऐसे लुटे-पिटे लोग पुलिस को नाकारा समझते हैं। हर भारतवासी को तो गार्ड मिल नहीं सकता। अलबत्ता वीआईपी सुरक्षा पर हो रहे धन व जन के बरबादी को रोक कर, उनका उपयोग ढंग से हो सकता है। अत: गृहमंत्री द्वारा सुरक्षा की पात्रता के मानक बदलना एक सार्थक प्रयास है।

खुद मुझे दो अनुभव हुए। इन्दिरा गांधी की प्रेस वार्ता थी। उनकी हत्या के ठीक दो सप्ताह पूर्व। हैदराबाद के राज भवन में पहली बार मेरी और पत्रकार साथियों की तलाशी हुई। दो दशकों की रिपोर्टिंग के दौरान यह प्रथम अवसर था। मेरे प्रतिरोध पर प्रधानमंत्री ने बताया कि अमृतसर में ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद उनके सलाहकारों ने कड़ी चेतावनी दी है अत: यह हो रहा है। वे दुखी थी, खेद व्यक्त कर रही थीं। सुरक्षा गार्डों में कटौती का निर्देश दिया। ऐसा ही फिर हुआ था लखनऊ  के राज भवन में। राजग प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की प्रेस वार्ता थी। सुरक्षाबल अपनी पर आमादा थे। लखनऊ के सांसद ने रोक दिया यह कहकर कि वे स्थानीय एमपी पहले है और देश के पीएम बाद में।

इसीलिए यह घटिया लगता है कि जो जितना निचले ओहदे पर हो, वह गार्डों का उतना ही ज्यादा जमावड़ा पंसद करता है। इस दिखावटीपन को मनोविश्लेषक हीनग्रंथि करार देंगे। लेकिन है यह मरी हुई सामन्ती प्रवृत्ति की घृणित नकल। एक अन्य पहलू हो सकता है। मजबूती से यह तर्क पेश हुआ कि आंतकियों के तरीके अत्याधुनिक हो गये हैं। अत: सुरक्षा में कोई कोरकसर नहीं छोड़ सकते। यह अर्धसत्य है। ऐहतियात बरतने से खतरा घट सकता है। आशंकाये कम हो सकती हैं। मगर सम्पूर्ण सुरक्षा तो तैंतीस करोड़ देवता भी नहीं मयस्सर करा सकते हैं। यदि भारतीय गुप्तचर संस्थायें उन्मेषित रहे, दायित्व बोध सम्यक रखें तो कई बलायें टल सकती हैं। घोड़ों की चोरी के बाद अस्तबल के फाटक बन्द करने का उदाहरण बाम्बे शेयर बाजार ब्लास्ट (1993) तथा गत वर्ष 26/11 के दिन मिला था। तब वीटी स्टेशन के पुलिस वाले की बन्दूक में गोली अटकी रही थी, क्योंकि महीनों से उसने नली साफ नहीं की थी।

ताजातरीन तौर पर तो वीआईपी यात्राओं में मितव्ययिता काफी चर्चित हुई है। बासठ साल में जननेता और नौकरशाह की नवधनाढ्य जैसी ऐय्याश जीवन शैली, राजकोष से निजी फिजूलखर्ची, उसकी लूट तो अलग, आज एक आम नजारा बन गया है। अधिक क्लेशदायी बात हम श्रमजीवी पत्रकारों के लिए यह हो गई है कि समाचारपत्रों में आजकल सादगी सुर्खियों में है। कैसी खबर है यह? सादगी की परिभाषा निर्धारित करते समय कुछ शब्दों की परिभाषा कर लें। कंजूसी सादगी नहीं हो सकती। विश्व का सबसे अमीर व्यक्ति था हैदराबाद का निजाम मीर उस्मान अली खाँ। वह उपहार वसूलता था और पैबन्द लगी अचकन पहनता था। निजाम का जीवन सादगीपूर्ण कभी भी नहीं कहा जा सकता। वह कृपण था। खादी पहनना और रोज का खर्चा हजारों में करना, जो आप राजनेताओं का स्टाइल है, वह सादगी नहीं, ढोंग है। आवश्यक न हो तो खर्च न करना किफायत कहलाती है।

उत्तर प्रदेश के महाबली मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्त अपने इशारों पर धन्नाशाहों को नचाते थे। उनके एक फोन पर कांग्रेस पार्टी को करोड़ों रुपए मिल जाते थे। वे खुद पुराने लखनऊ में संकरी सड़कवाले पान दरीबा मुहल्ले में बने अपने पुराने सेवाकुटीर नामक मकान से शासन करते थे। खादी की चड्डी और बनियान उनकी पोशाक थी। हाँ महिला मुलाकाती आ जाये तो गमछा ओढ़ लेते थे। यहां जनता पार्टी के प्राधानमंत्री स्वर्गीय मोरारजी देसाई का उदाहरण देखें। बड़ा दुष्प्रचार किया वामपंथियों ने कि पूंजीशाहों के एजेन्ट तथा अरबपति हैं मोरारजी देसाई। मगर जब सर्वोच्च न्यायालय ने मोरारजी देसाई की अपील खारिज कर मुम्बई में उनके किरायेवाले निवास को मकान मालिक को लौटाने का आदेश दिया तब देश को पता चला कि पूर्व प्रधानमंत्री नब्बे-वर्षीय मोरारजी देसाई का भारत में निजी भवन भी नहीं है। तब उनके विरोधी मुख्यमंत्री शरद पवार ने उन्हें मुम्बई में एक छोटा फ्लैट आवंटित किया।

आज भी सादगी का जीवन बिताने वाले हैं देश में। ममता बनर्जी 15 रुपयेवाली हवाई चप्पल और 70 रुपयेवाली सफेद साड़ी पहनती हैं। कलकत्ता में झोपड़पट्टीनुमा सादे मकान में रहती है। तुलना में उनके मार्क्सवादी कम्युनिस्ट विरोधियों की जीवनशैली देंखे। सादगी के समक्ष सिजदा करने वाले दलित पुरोधा और समाजवादियों को तो देखते बनता है। इतनी लिप्सा, सुरसा के मुंह जैसी संचय प्रवृत्ति! अल्पविराम तक नहीं इस लूट की चाहत में? इसीलिए गांधी, लोहिया की याद आना सहज है। क्योंकि अपरिग्रह मानवीय गुण है। जो उनमें भरा पड़ा था।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

k.vikramrao@gmail.com

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