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उर्दू मीडिया : बदलते कश्मीर का आईना

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की समझ है कि सरदार बल्लभभाई पटेल आज देश के प्रधानमंत्री होते तो वादी-ए-कश्मीर में आतंकी सेना के जवानों के सीने गोलियों से छलनी करने का दुस्साहस नहीं कर पाते। जम्मू-कश्मीर से रह-रहकर आ रही खुशवारियों का झोंका बताता है कि मोदी को पुनर्विचार करना चाहिए। कश्मीर के हालात में काफी तब्दीली आई है। बदलाव के चलते ही घुसपैठ की ताक में सीमा पर सक्रिय तीन सौ पाक घुसपैठिये अब तक कामयाब नहीं हो पाए। आतंकवादियों को पहले की तरह अब स्थानीय समर्थन नहीं मिल रहा।

लोग उनके खिलाफ आवाज बुलंद करने लगे हैं। आम अवाम के साथ सरकार भी हाल को बदलने पर खास ध्यान दे रही है। पिछले सप्ताह जम्मू-कश्मीर से आने वाली खबरें इसका ताजा उदाहरण हैं। अलगाववादी संगठन जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट के सर्वेसर्वा यासीन मलिक अपने ‘जन आंदोलन’ से इतर पारिवारिक जीवन को खुशहाल बनाने को लेकर ज्यादा संजीदा नज़र आ रहे हैं। पाकिस्तान से अपनी नई-नवेली दुल्हन को भारत लाने की उनकी बेचैनी इसकी बेहतर मिसाल है। पत्नी को लाने तक मलिक बेहद परेशान रहे। एक अच्छी खबर ‘बीबीसी’ के उर्दू पोर्टल पर वाशिंगटन से आई। कश्मीर हुर्रियत कान्फ्रेंस के रहनुमा मीर वाइज फारूक ने अमेरिकी मीडिया के सामने कबूला। ‘कश्मीरी आंदोलन की कामयाबी, इसके माथे पर लगे आतंकवाद के कलंक के मिटने के बाद ही संभव है।’

कश्मीर से एक और खबर आई है। श्रीनगर के सिवालिया गांव के अयाज अहमद मलिक एड्स पर उल्लेखनीय काम करने के लिए विज्ञान और तकनीकी मंत्रलय के ‘यंग साइंटिस्ट एवार्ड’ से नवाजे गए। ‘डेली आफताब’ के मुताबिक, वजीर-आला उमर अब्दुल्लाह अपने मुंबई के हालिया दौरे के बाद सूबे में साढ़े आठ सौ करोड़ रुपये के पूंजीनिवेश की मंजूरी लेकर लौटे हैं। होटल ताज ने भी अपना नया प्रोजेक्ट लाने की हामी भर दी है। जम्मू-कश्मीर का उर्दू मीडिया समझता है कि इससे सूबे में रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। बेरोजगारी कम होने से नवजवानों में भटकाव कम आएंगे। आतंकियों की सरगर्मी के चलते कश्मीर का पर्यटन उद्योग पूरी तरह चरमरा चुका है। नई परियोजनाएं इसपर छाई उदासी कम कर सकती हैं। ‘सहाफत’ ने भी एक अच्छी खबर दी है। दशकों बाद वादी-ए-कश्मीर के हिंदुओं ने कश्मीर पंडित संषर्घ समिति के बैनर तले धूमधाम से दशहरा पर्व मनाया। बक्शी स्टेडियम में रावण दहन पर पुलते बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के मुस्लिम कारीगर बुलाए गए थे।

राजौरी की एक नाबालिग बच्ची रुखसाना तो वादी की बदलती तस्वीर का आईना बनकर उभरी है। उसके कारनामे से मीडिया और आम कश्मीरी किस कदर उत्साहित है। जम्मू-कश्मीर से आने वाली एक मीडिया रिपोर्ट के शीर्षक ‘कश्मीर की शेरनी रुखसाना नवजवान लड़कियों की आइडियल बनी’ से अंदाजा लगाया जा सकता है। अखबार कहता है। ‘जहां लोग दहशतगर्दो के जुल्म व जबर के साये में चलती फिरती लाश की तरह जी रहे थे। इस बच्ची ने उनके मुर्दा दिलों को हौंसला दिया है।’ जम्मू से तकरीबन 160 किलोमीटर दूर रहने वाले रुखसाना के परिवार वालों पर आतंकियों को मुखबिर होने का शक है। इसलिए सबक सिखाने की नीयत से तीन आतंकी हरबे-हथियार के साथ उसके घर में घुस आए। पहले तो लड़की के मां-बाप से मार पिटाई की गई। उसके बाद अस्मतदरी की नीयत से उसे उठाने का प्रयास किया गया। रुखसाना एके 47 व एके 56 की परवाह किए बिना, उनसे भिड़ गई। आतंकियों के सरगना अबु उस्मा उर्फ ‘दो किलो’ को कुल्हाड़ी से काट डाला। फिर भाई ऐजाज की मदद से ऐसे हालात पैदा कर दिए। बाकी जिंदा बचे आतंकियों को भागना पड़ा।

मारे गए आतंकी के बारे में कहा जा रहा है। वह पाकिस्तानी नागरिक था। पिछले चार सालों से राजौरी एरिया में जैश के कमांडर की हैसियत से सक्रिय था। रुखसाना की बहादुरी पर एक अखबार में शाहिद हमदानी लिखते हैं- ‘मार्दो वाले हाथ दिखाए, रुखसाना शाबाश, एक को मारा दो भगाए, रुखसाना शाबाश।’ पिछले सप्ताह मीडिया में जम्मू-कश्मीर को लेकर कुछ ऐसी खबरेंआईं। जिसे लेकर बवाल मचने का गुमान हो रहा था। ऐसी खबरों में संयुक्त राष्ट्र की जनरल मिटिंग में लीबीया के सदर कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की आजाद कश्मीर की वकालत करना और शोपियां कांड में दो युवतियों की लाश कब्र से निकाल कर दोबारा पोस्टमार्टम करना है। गद्दाफी की बातों का चीन व सऊदी अराब ने भी समर्थन किया। उनके सुर में सुर मुत्तहदा जहादी काउंसिल के चेयरमैन सैयद सलाउहद्दीन ने भी मिलाए हैं। लेकिन वादी खामोश रही। शोपियां दोहरे हत्याकांड की शिकार नीलोफर और उसकी ननद आसिया जान की दोबार पोस्टमार्टम किए जाने से लोग थोड़ा नाराज जरूर दिखे, पर उन्होंने भी ज्यादा हंगामा नहीं काटा।                              
 

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं

malik_hashmi64@yahoo.com

 

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