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फ्वेरबाख के ईश्वर

लुडविग फ्वेरबाख ने दर्शन मे ‘मानवता धर्म’ को प्रतिस्थापित किया। ‘ईसाईयत सार’ उनके ऐसे विचारों का संग्रह है। इसके पहले भाग में उन्होंने धर्म का सच्चा या मानवशास्त्रीय सार और दूसरे में धर्म का मजहबी या झूठा सार बताया है। ग्रंथ की भूमिका में धर्म और मनुष्य के मुख्य स्वाभाव की विवेचना है। फ्वेरबाख हीगल के दर्शन से  सबसे अधिक प्रभावित थे। उन्होंने हीगल के दर्शन को उसके वास्तविक लक्ष्य द्वंद्वात्मक भौतिकवाद तक पहुंचाया। वे प्रगतिगामी हीगलीय दल के अगुआ थे। आगे एंगल्स और मार्क्स भी इसी दल में शामिल हुए। 

फ्वेरबाख ने बताया कि मानव के अस्तित्व का आधार उसके मानव होने के नाते मिली सर्वोच्च शक्तियां- समझना, इच्छा और प्रेम करना है। इन तीनों चीजों के बिना मानव कुछ नहीं है और यही उसके स्वाभाव की बुनियादी ईंटें हैं। वे कहते हैं कि मानव के लिए परमतत्व कुछ और नहीं, बल्कि उसका अपना स्वाभाव है। धर्म के बारे में फ्वेरबाख का मत है कि मानव की आत्मचेतना को एक स्वतंत्र अस्तित्व के तौर पर आसमान पर चढ़ाना ही धर्म है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जैसे विचार, जैसी प्रवृतियां होती हैं, वैसा ही उसका ईश्वर होता है। किसी भी व्यक्ति से उसके ईश्वर को और ईश्वर के जरिये उस व्यक्ति को जाना जा सकता है। मानव और उसके ईश्वर को वस्तुत: वे एक ही मानते है।      

फ्वेरबाख धर्म विरोधी नहीं हैं, लेकिन उनका धर्म केवल मानवता प्रेरित धर्म है। वे कहते भी हैं कि धर्म पवित्र चीज है, किंतु जो चीज धर्म में प्रथम स्थान रखता है यानी ईश्वर, वह खुद मानव है और जो चीज धर्म के लिए दूसरे दर्जे की है यानी मानव, वही ईश्वर है। फ्वेरबाख की आलोचना इस बात को लेकर की गई कि वे धर्म की दार्शनिक आलोचना तो करते हैं, किंतु साथ ही नास्तिकवाद को ‘धर्म’ के रूप में देखना चाहते हैं। 

 

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  • Web Title:फ्वेरबाख के ईश्वर