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महाबली की मात

यह कोई नहीं कह सकता कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति नहीं है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था समूचे यूरोपियन यूनियन की अर्थव्यवस्था में बड़ी है। अगर अमेरिका में सबप्राइम संकट आता है तो सारी दुनिया में मंदी छा जाती है। सैन्य शक्ति के मामले में कोई देश उसके आस-पास भी नहीं ठहर सकता। लेकिन क्या यह महाबली देश अपनी सर्वोच्च स्थिति से फिसल रहा है। 2016 के ओलंपिक की मेजबानी के लिए रियो द जेनेरो की शिकागो के मुकाबले में जीत के बहुत ज्यादा मायने नहीं पढ़े जाने चाहिए, लेकिन उभरती हुई ‘ब्रिक’ अर्थव्यवस्थाओं में से एक की अमेरिका पर जीत प्रतीकात्मक तो है ही। दरअसल अमेरिका उतना नहीं फिसल रहा है, जितना दूसरे तरक्की कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट तो अमेरिका की घरेलू समस्या से शुरू हुआ, लेकिन उसके निवारण के लिए चीन और भारत की ओर से देखा जा रहा है। ब्राजिल अगर ओलंपिक की मेजबानी करना चाहता है तो इसकी वजह अपने आत्मविश्वास और हैसियत की घोषणा करना भी है, जैसे कि चीन ने 2008 में ओलंपिक की सफल मेजबानी करके किया था। दरअसल
अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के कर्णधार की अमेरिका की हैसियत को चुनौती देने के लिए ही यूरोपियन यूनियन बनी थी। आर्थिक मंदी ने अमेरिका की कमजोरी को जाहिर भी कर दिया। अफगानिस्तान और इराक की लड़ाइयों ने अमेरिका के सैनिक वर्चस्व पर भी प्रश्नचिह्न् लगा दिया। बेशक अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैनिक शक्ति है और आइंदा लंबे वक्त तक उसकी इस स्थिति को चुनौती कोई नहीं दे सकता, लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका फिलहाल किसी देश पर इकतरफा सैन्य कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है। दरअसल दुनिया लंबे वक्त तक एकध्रुवीय रह नहीं सकती और भूमंडलीकरण ने कई देशों को उभरने का मौका दिया है। ब्राजील को ओलंपिक मिलने में इस तथ्य की बड़ी भूमिका रही कि लातिन अमेरिका में आज तक कोई ओलंपिक नहीं हुआ, लेकिन कुछ साल पहले तक यह नहीं सोचा जा सकता था कि कोई लातिन अमेरिकी देश ओलंपिक चाहने की हिम्मत कर सकता है। दुनिया के ओलंपिक में अमेरिका सबसे बड़ा खिलाड़ी आज भी है, लेकिन अब दूसरे खिलाड़ी भी मुकाबले में हैं।

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