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मुंबई को मिटाकर किस पर राज करेंगे ठाकरे

श्रीमंत राज ठाकरे को नया बहाना मिल गया है। एक फिल्म में मुंबई के लिए बॉम्बे शब्द इस्तेमाल क्या हो गया कि उन्होंने हंगामा बरपा कर दिया। निर्माता करन जौहर ने उनसे माफी मांग कर मामले को खत्म करने की कोशिश की, पर उन्हें मुंह की खानी पड़ी । राज जब आग उगल रहे हों तो भला उद्धव पीछे क्यों रहें? उन्होंने भी कहा कि सिर्फ एक आदमी से माफी मांगने से काम नहीं चलेगा। अब बेचारे करण जौहर क्या करें? किस-किससे माफी मांगें? ठाकरे बंधुओं के लिए तो यह चुनावी ब्रह्मास्त्र है, पर उनके सामने तो करोड़ों रुपये मिट्टी में मिल जाने का खतरा पैदा हो गया है।
ठाकरे परिवार की यह पुरानी अदा है। आप याद कर सकते हैं। मणिरत्नम ने जब बॉम्बे फिल्म बनाई थी, तब बाल ठाकरे अड़ गए थे। मणि को ‘मातोश्री’ जाकर माफी मांगनी पड़ी थी। रामू को भी ‘सरकार’ के लिए सफाई देने ‘बाला साहेब’ के पास जाना पड़ा था। बाल ठाकरे लोकशाही नहीं, ‘शिवाशाही’ में यकीन करते हैं, यानी जो उन्होंने कह दिया, वही अटल है। पर वो पुराने दिन थे। शिवसेना प्रमुख मराठी मानुष के अकेले आका हुआ करते थे। उनका अभयदान पर्याप्त होता था। अब बंबई.. नहीं-नहीं.. मुंबई के कारोबारी सांसत में फंस गए हैं। राज उन्हें धमकाते हैं तो उद्धव का कोप भी उन्हें ङोलना पड़ता है। एक तरफ दावानल है तो दूसरी तरफ आग का दरिया। जाएं तो जाएं कहां? सवाल उठता है कि ठाकरे बंधु महाराष्ट्र और मराठियों को किस तरफ खींच रहे हैं? कभी अकालियों ने पंजाबी आन-बान-शान को लेकर एक आंदोलन छेड़ा था। अगर उसका स्वरूप सामाजिक और सांस्कृतिक रहा होता तो कोई बात नहीं थी। गड़बड़ तो तब शुरू हुई, जब यह मांग सत्ता की म्यूजिकल चेयर का हिस्सा बन गयी। हम आज भी खौफ से पंजाब के उन काले दिनों को याद करते हैं, जब धर्म के नाम पर मरजीवड़े सरेआम लोगों का खून बहाया करते थे।
इस तकलीफदेह तमाशे ने क्या-क्या गज़ब नहीं ढाए? हरमंदिर साहब में फौज को घुसना पड़ा। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके घर में उनके अंगरक्षकों ने ही गोलियों से भून दिया। हमारी सदियों पुरानी सहअस्तित्व और अहिंसा की अवधारणा कुछ समय के लिए समूची दुनिया के सामने शर्मसार हो गई। मैं अच्छी तरह जानता हूं। महाराष्ट्र में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा, पर यह शाश्वत सत्य है कि बबूल का बीज बोने पर आम के पेड़ नहीं उगा करते। राहुल राज को याद कीजिए। मुंबई की डबल डेकर बस की खिड़की से तमंचा लहराते हुए उसे बहुतों ने टीवी पर देखा था। वह कोई प्रशिक्षित आतंकवादी नहीं था। एक ऐसा नौजवान था, जो सुनहरे भविष्य के सपने लेकर बिहार से इस महानगरी तक पहुंचा था। वह जानता था कि उसकी बढ़त के साथ उसकी परिवार की आशाएं भी हैं। वह यह भी जानता था कि मध्यमवर्गीय पिता उसके लिए आर्थिक तौर पर कितना भार उठा रहे हैं। पर राज ठाकरे की वाणी से निकला जहर समूची हवा को इतना विषाक्त बना गया था कि एक आदर्शवादी नौजवान का दिल दिमाग बेकाबू हो गया।
उस दृश्य को याद कर आज भी झुरझुरी दौड़ जाती है। हथियारबंद पुलिस ने जब उसकी बस को घेरना शुरू किया तो अकुलाता हुआ वह बच्चा दौड़-दौड़ कर बस के शीशे बंद करने लगा। शायद वह समझ गया था कि ये पुलिस वाले नहीं यमदूत हैं, जो उसकी तरफ बढ़ रहे हैं। बाद में वही हुआ, जो नहीं होना चाहिए था। यह जानते हुए भी कि राहुल राज के तमंचे की रेंज कितनी है, लांग रेंज हथियारों से लैस महाराष्ट्र पुलिस के लोगों ने उसे मार गिराया। वे चाहते तो घबराए हुए राहुल से हथियार रखवा सकते थे। न मानता तो उसके पैर में गोली मार कर उसे बेबस कर सकते थे। पर नहीं। उन्होंने उसे सीधे मार गिराया। जिस बालक पर पिता के सपनों को परवान चढ़ाने का बोझ था, वह खुद पिता के कंधों पर सवार हो कर अंतिम यात्रा पर निकला। उस दिन ऐसी बहुत सी आंखें भीगीं थीं, जिन्होंने कभी रू-ब-रू उस नौजवान को नहीं देखा था। इसी को संवेदना कहते हैं, पर राजनीति कितनी संवेदनहीन होती है? आज इतने दिनों बाद भी महाराष्ट्र सरकार यह तय नहीं कर सकी है कि वह मुठभेड़ थी या हत्या? सरकार कोई भी हो, उसकी नज़र वोट बैंक पर होती है, चाहे उस बैंक में हत्यारों, अपराधियों और लुटेरों का कब्जा क्यों न हो? यह जांच भी इसी प्रवृत्ति का शिकार हुई है।
एक तरफ मुंबई में बैठे राज ठाकरे अंगारे बोने का काम कर रहे थे, पर उससे झुलसे हुए बिहार के लोग कितने शालीन थे? राहुल राज के पार्थिव शरीर को पवित्र अग्नि के हवाले करने के बाद भी वे जज्बाती नहीं हुए। उन्होंने मुंबई या महाराष्ट्र जाने वाली ट्रेनों में मराठियों को निशाना नहीं बनाया। इसके उलट उन्हें फूल भेंट किए। मुन्ना भाई की गांधीगिरी से प्रभावित मीडिया के एक तबके के लिए कि यह गांधीगिरी थी। पर मुझे पता नहीं क्यों बुद्ध याद आए। नेपाल में जन्म लेने के बावजूद उन्हें बोध बिहार में ही हुआ था। यह क्या सिर्फ संयोग है कि मोहनदास करमचंद गांधी को भी जनांदोलन खड़ा करने की सूझ चंपारण में आई थी? बिहार के सामान्य जन ने जाने अनजाने यह पैगाम एक बार फिर पूरी दुनिया को दे दिया था कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं होती।
ठाकरे बंधु कहते हैं कि उत्तर भारतीयों ने महाराष्ट्र में आकर हमारे लोगों के अवसर छीन लिये हैं। वे यह भी आग उगलते हैं कि उत्तर भारतीयों का लगातार आना जारी है। पर आंकड़े कुछ और कहते हैं। वृहतर मुंबई में पिछली दो जनगणनाओं के बीच आबादी की ग्रोथ 2.62 प्रतिशत है। इसके मुकाबले दिल्ली बहुत तेजी से बढ़ रही है। यहां की जनसंख्या हर साल 4.18 प्रतिशत बढ़ जाती है। अगर इस बढ़ोतरी को ही रोजगार के अवसरों का पैमाना मानें तो सूरत ने सबको पीछे छोड़ दिया है। वहां हर बरस 6.16 फीसदी लोग बढ़ रहे हैं। काश कोई ठाकरे भ्राताओं को बताए कि पटना में यह वृद्धि दर 4.40 प्रतिशत है, यानी मुंबई से लगभग दोगुनी। कहने की जरूरत नहीं कि अलगाव का यह प्रलाप महाराष्ट्र को ही नुकसान पहुंचा रहा है।
नई दिल्ली हो या पटना या फिर सूरत। इनमें से कहीं भी अलगाव का कोई नारा कभी नहीं फूटता। इनके दरवाजे सबके लिए खुले हैं। इसीलिए यहां सबके साथ रहने, साथ चलने और साथ बढ़ने की गुंजाइश बढ़ती जा रही है। अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मुंबई की आर्थिक ताकत का एक बड़ा हिस्सा यह शहर बांट लेंगे। तब क्या करेंगे राज ठाकरे, तब क्या सपने संजोएंगे उद्धव ठाकरे? उन्होंने यह कहावत तो सुनी ही होगी कि सुल्तान सिर्फ सल्तनतों पर ही हुकूमत करते हैं। इन लोगों ने तो अपने और अपने लोगों के पैरों पर जैसे कुल्हाड़ी मारने की कसम खा रखी है ।
अपने छोटे शहरों की बढ़ती हुई ताकत को देखकर न जाने क्यों गुनगुनाने का मन कर रहा है- हिंदी हैं हम, वतन है, हिंदोस्तां हमारा। आप मेरे साथ क्यों नहीं गुनगुनाते?
shashi.shekhar@hindustantimes.com

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