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जनमोदन मनमोदन

एक ओर मंदी छाई है। दूजी ओर हिंदी कविता में बहार आई है। मंदी ने बड़े-बड़ों के भाव उतार दिए। हिंदी कविता के भाव का डाउनटर्न नहीं आया। कायदे से तो अपनी चढ़त के लिए उसे ‘बल्ले-बल्ले’ करना चाहिए, किंतु हिंदी कविता में यह ‘बल्ले-बल्ले’ भाव नहीं दिखता। ‘हाय-हाय’ का भाव ज्यादा दिखता है। हिंदी कवि कितना भी ‘हाय-हाय’ करे

पढ़ने वाले के मन में रत्ती भर हमदर्दी नहीं उभरती। हिंदी कविता में जो ‘हाय-हाय’ व्याप्त है, वह हाय-हाय का ‘रीयलिटी शो’ जैसा है।
आप अगर उस हाय-हाय की वजह यानी सचमुच की चोट ढूंढने चलें, सचमुच का दुख चीन्हने चलें तो मजाल कि वो मिल जाए! ‘हाय-हाय’ भी एक अदा की तरह आती है। एकदम शुष्क और मनहूस! सच्ची वेदना की तरह नहीं। हिंदी कविता से पूछिए कि री कविते! तेरे भावानुभावव्यभिचारियों को क्या हुआ? तेरा आलंबन कहां है? कौन है? और वह तेरे संग ऐसा क्या जुल्म करता है कि तू रोती रहती है? इतना डरी हुई रहती है तो अपने अतिचारी की पहचान क्यों नहीं कराती? सच मानिए कविता में इन सवालों का जबाव ढूंढ़े न मिलेगा। 
कुछ अपने मुंह मियां मिट्ठ बने अक्सर कहा करते हैं कि आज की हिंदी कविता का स्तर ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर’ का है। किसी देश की कविता से वह हीन नहीं है। कवियों की हीनता से उपजी निरी ऐंठ, हेकड़ी और मनमानी क्षतिपूर्ति ही उसका मानक है।
जिस कविता की पांच प्रतियां हिंदी के इत्ते बड़े बाजार में नहीं बिकती, वह ‘विश्व स्तर’ की है! कोई तर्क नहीं। प्रमाण नहीं। लेकिन कुछ पंचों ने कह दिया तो मुंडी हिलाइए कि जी अपनी कविता तो दुनिया से आगे है। यही तेवर तो बेभाव के ‘भाव चढ़ाने’ का टोटका है। रीयल वैल्यू जीरो, लेकिन दाम मनमाने। यह धुप्पल की इकनॉमी है।
हिंदी साहित्य में धुप्पल की इकनॉमी बड़ी कारगर है। ऐसे में माल एकाध बार उठे तो उठ जाए, अन्यथा गोदाम में ही सड़ना है। ऐसे माल को न मंदी सताती है। न तेजी।
यह ‘जन-मोदक’ नहीं ‘कवि-मन-मोदक’ है। जनमोदक का जनता से संबंध है। ‘मनमोदक’ का सिर्फ कवि के मनोजगत से। मनमोदक बड़ा मनमोहक है। मनमानी महानता मिल जाती है। इसी मनमाने महान गुमान के कारण हिंदी का कल्पना-कुटीर उद्योग चलता रहता है। कविता का उर्वर प्रदेश पलक झपकते हरा-भरा हो उठता है।
पुराने कवि बरसों अभ्यास करते। कई भाषाओं को जानते। एक लाइन लिखते कि संपादक प्रवर महावीर प्रसाद द्विवेदी जी करेक्ट करने को कहते कि ऐसे लिखो और तब जाकर मैथिलीशरण गुप्त बनते। इनाम, पारितोषिक, सम्मान कुलजमा एकाध होते। साहित्यकार साधना करते। लेकिन समकालीन साहित्य में इनामों की सेल लगी रहती है। कला की साधना कौन करे? कौन साहित्य की परंपरा से सीखे? किसी कवि की कविता को कौन जाने? अपनी ही जाननी है। अपनी पढ़नी है। बस!
हिंदी में एक कवि ऐसा नहीं, जिसे अपनी ही कविता पूरी याद हो। कवि पढ़कर बांचते हैं। उनकी याददाश्त में उनकी लाइनें नही रहतीं। ‘दिल की कलम’ से कोई दर्द निकलता तो याद रहता। किसी लातीनी, यूरोपीय कवि की कविता की नकल से निकली तो याद कैसे रहे? हिंदी की पंरपरा ‘हृदय से कंठ तक’ की  परंपरा रही है। अब कविता से कंठ कैंसिल है। गला सूखा है।
कोई भी कवि पूंजीवाद की कृपा से गरीबी की रेखा के नीचे नहीं रहता बहुत ऊपर रहता है। खाते-पीते अघाते मध्यवर्ग में ठाठ करता है। इन्हें देखकर लगता है कि गरीबी की बात करते-करते भी गरीबी की रेखा से बहुत ऊंचे उठा जा सकता है। सबके पास डिजाइनर कपड़े, मारुति आठ सौ से आगे वाला मॉडल और कैमरा-मोबाइल है और सबके ऊपर ढेर सारे भक्त चेले चांटी ‘लौंडेलपाड़े’ तक हैं।
हिंदी का जगत बदल गया है, लेकिन कविता नहीं बदली। लेकिन हिंदी कविता न खुलकर रोती है न हंसती है। और अगर कभी गलती से प्रेम का एंगिल पड़ गया तो वह ऐसा निरींद्रिय और कठिन भाषा में होता है कि उसे देख प्रेमिका पहले ही कवि से ‘तीन तलाक’ ले ले। हिंदी कविता की चौखट मनहूस है। उसका मानसरोवर सूख गया है। भाव के हंस उड़ गए हैं।
अरसे से एक ठो ‘मस्त कविता’ ढूंढ रहा हूं। ‘मस्त’ यानी एक ठो ‘खुश कविता’। ऐसी कविता जो सामने आए तो आनंद से भर दे। रसनिमग्न कर दे। दैनिक किचकिच से खिन्नायमान, भिन्नायमान जनमन को प्रमुदित कर दे। मूड बदल दे। तरोताजा कर दे। और उस पुरानी कविता की तरह कह उठे- ‘हम मस्तानों की क्या हस्ती है, आज यहां कल वहां चले मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहां चले!’
है कोई जो नई युवा पीढ़ी का ‘मनमोदन’ करने वाली ‘चार लाइनें’ लिखे! याद रखें जनमोदन ही मनमोदन होता है।

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