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गहरी समस्या की हल्की रिपोर्टिंग

नक्सलवाद के मुद्दे पर ठोस बातों को लोगों के सामने रखना मीडिया की कोशिश रही है। टीवी और अखबारों में नक्सली इलाकों में विकास की कमी पर काफी चर्चा हुई है, अगर टाइम्स नाउ जैसे अंग्रेजी चैनल सिर्फ नक्सलियों की हिंसा को उछालते हैं, एनडीटीवी 247 के बिग फाइट प्रोग्राम पर कुछ दिन पहले सभी दृष्टिकोण के लोग पेश किए गए। कई बातें सामने आई। भाजपा के रवि शंकर प्रसाद के अलावा सब सहमत थे कि विकास की कमी की वजह से 40 साल बाद भी इस समस्या का समाधान नहीं निकल पाया।

पिछले महीने में तहलका पत्रिका ने अपनी कवर स्टोरी में बहुत सारी बातें उठाई। ऑपरेशन ग्रीन हंट के बारे में कहा गया कि सरकार अपने ही लोगों पर युद्ध करने जा रही है। इसका नतीजा क्या होने वाला है? क्या सैन्य कार्रवाई से नक्सली मामला हल होगा? पर लगता है गृह मंत्री पी. चिदंबरम विकास पर जोर देने की बात को अहमियत नहीं देना चाहते। उन्होंने एक से ज्यादा इंटरव्यू में साफ कहा है कि यह विचारधारा की लड़ाई नहीं है, नक्सलियों का उद्देश्य युद्ध है और हमें उसका सामना सैनिक कार्रवाई से ही करना पड़ेगा। उन्होंने सीपीआई-एमएल वेबसाइट की बात की। और उसके बाद उनके मंत्रलय ने अपना विज्ञापन शुरू किया, जिसमें कहा जा रहा है कि नक्सलवादी खूनी हैं।

अखबारों में विकास के मुद्दे पर रोज कुछ न कुछ लिखा जा रहा है। पर सरकार रणनीति पर इन बातों का कम असर पड़ा है। जहां कुशल प्रशिक्षत और बेहतर सुरक्षा बलों को तैनात करने की बात हो रही है, क्या वहां सरकार के सबसे अच्छे अफसर भी तैनात किए जाएंगे? वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, सड़क बिजली जैसी सुविधाएं भी पहुंचेगी क्या? ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई है। मीडिया ने भी इस प्रश्न को नहीं उठाया। दो अक्तूबर की तरह जब हिंसा की खबर आती है तो मीडिया उसे हेडलाइन बना देता है। ऐसा कवरेज विकास के मुद्दे को नहीं मिलता। छत्तीसगढ़ के लोगों की बुरी हालत की तस्वीर हमारे टीवी चैनलों पर प्रतिदिन पेश नहीं होती। क्या ऐसा करने से फर्क पड़ेगा? तब पड़ेगा जब देश के राजनीतिक नेता भी इस बात को उठाने लगेंगे। मीडिया और सिविल सोसाइटी जब जुड़ते हैं, तब अभियान बनता है।
पहली समस्या तो यह है कि मौका मिलते ही रिपोर्टर और टीवी कैमरा शख्सियतों की तरफ मुड़ जाते हैं। जब से कोबाद घांडी की गिरफ्तारी हुई, उनके जीवन पर कवरेज होने लगा।
दूसरी समस्या यह है कि माओवाद पर स्टूडियो में चर्चा करना आसान है, लेकिन मौके से रिपोर्ट लाना मंहगा और कठिन। तीसरी समस्या है कि मीडिया को स्टोरी चाहिए, वह देश बदलने का काम नहीं कर रहा।
किसी भी मुद्दे पर जोरदार चर्चा होने के लिए बहुत जरूरत इस बात की होती है कि दर्शक उस पर बड़ी तादाद में सक्रिय प्रतिक्रिया दे। पिछली नवम्बर में आतंकवाद इतना बड़ा मुद्दा बन गया, क्योंकि देश के मध्य और उच्चवर्ग के लोगों ने उसका असर महसूस किया। बड़े शहरों में रहने वाले लोगों पर नक्सली हिंसा का असर नहीं पड़ता है। इसलिए इस वर्ग का दबाव सरकार पर नहीं आएगा। जब वह माओवादी हल्ला बोलते हैं तो गांवों में बोलते हैं। इसलिए सरकार के ऑपरेशन ग्रीन हंट पर भारी चर्चा नहीं हो रही है।
 मगर इससे क्या नुकसान हो सकता है? यही कि कश्मीर और पूर्वोत्तर के बाद देश का और एक हिस्सा फौज के हवाले होने जा रहा है। छत्तीसगढ़ के लोगों पर पुलिस का अत्याचार वैसे भी बहुत बढ़ गया था, अब दूसरे सुरक्षा बलों के जवान भी उनके इलाकों में भर जाएंगे।

जहां मध्यवर्ग का मीडिया इस पूरे विषय पर जरूरत से कम ध्यान दे रहा है, वहीं नक्सली अपने मीडिया रणनीति को मजबूत करते जा रहे हैं। उनके वेबसाइट बढ़ती जा रही हैं, अगर सरकार एक पर प्रतिबंध लगाती है, तो दूसरी वेबसाइट शुरू हो जाती है। जब पीपुल्स मार्च पब्लिकेशंस के सम्पादक जेल गए, वह पत्रिका बंद हुई पर उनके जेल से निकल आने के बाद पीपुल्स ट्रथ के नाम से शुरू एक इंटरनेट प्रकाशन शुरू हो गया।
www.bannedthought.net वेबसाइट की और एक खासियत है। अगर आपको लालगढ़ पर किसी भी अखबार का लेख या टीवी प्रोग्राम की जानकारी चाहिए, यहां उसके सब लिंक मिलेंगे। अल जजीरा चैनल ने एक 22 मिनट का फीचर किया था, भारत के नक्सली आंदोलन के उफन पर। इसका लिंक भी यहां है।
नक्सली हिंसा का इस्तेमाल जरूर कर रहे हैं। पर साथ-साथ मीडिया प्रचार का भी। क्या सरकार का प्रचार उनका मुकाबला कर पाएगा?

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