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सुर के बिना जीवन सूना

सुर के बिना जीवन सूना

मन्ना डे किसी लीक पर नहीं चले। उन्होंने अपने रास्ते खुद बनाए। फिर उन रास्तों पर काफिले चल पड़े। उनके गीतों को सुनना सुगंधित झोंकों से रू-ब-रू होने की तरह है। ऐसे झोंकों जो आपके पास से गुजरे और आप आनंदित हो उठे। नब्बे साल की लंबी प्रतीक्षा के बाद ही सही उनकी गायकी को भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजने का फैसला लिया गया है। मन्ना डे फिल्मी दुनिया के ऐसे गायक हैं, जिन्होंने गायकी की हर विधा में गाया। गायकी में प्रामणिकता लाने के लिये उन्होंने प्रयोग भी खूब किये। मोहम्मद रफी ने मन्ना डे के लिये कहा था कि लोग मेरे गाने सुनते हैं और मैं सिर्फ मन्ना डे के। 90 वसंत देखने के बाद भी दमखम वैसा ही कायम है। आज भी गाते हैं और रोज रियाज करते हैं। मौत का उन्हें डर नहीं है। कहते हैं जाना तो पड़ेगा ही, किंतु अतृप्त होकर नहीं तृप्त होकर जाना चाहता हूं। इस जीवन से खुश हूं। जितना प्यार, सम्मान और यश मुझे मिला, उसे सपने में भी नहीं सोचा था। जो मेरा प्राप्य था, उससे ज्यादा मिला। दिलचस्प बात यह है कि यदि मन्ना डे गायक न होते तो जरूर बाक्सर या फिर पहलवान होते। इन दोनों खेलों में उनकी बचपन से ही रुचि रही। लेकिन वे अपने चाचा मशहूर संगीताचार्य के.सी. डे की संगत में जब आये तो उन्होंने संगीत को ही अपना आराध्य मान लिया। उन्होंने देश की हर भाषा में गाया। एक मई 1919 को कोलकत्ता में जन्मे मन्ना डे की शुरूआती शिक्षा कोलकता के एक साधारण से स्कूल इंदू बाबुर पाठशाला में हुई। बाद में उन्होंने विद्यासागर कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। स्कूल के दिनों से ही मन्ना डे की गायकी के चर्चा होने लगी थी। शुरूआत में वे गा कर अपने सहपाठियों का मनोरजंन किया करते थे। अंतर विद्यालय प्रतियोगिताओं में हमेशा वे शीर्ष पर रहे। 1942 में वे अपने चाचा के साथ पहली बार मुंबई गये। सचिन देव बर्मन के सहायक के रूप में काम शुरू किया। इसके बाद उन्होंने और भी संगीतकारों के साथ काम किया। इस दौरान वे क्लासिकल संगीत की शिक्षा उस्ताद अमान अली खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से लेते रहे। फिल्मी गायकी की शरूआत 1943 में तमन्ना फिल्म से की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। देशभक्ति, भजन, कव्वाली, सुगम संगीत, कामेडी गीत, रवीन्द्र संगीत सबका सब गाया उन्होंने। उनके खाते में 3500 से ज्यादा गीत हैं। 18 दिसम्बर 1953 में उन्होंने केरल की सुलोचना कुमारन से शादी की। उनके दो बेटियां शुरोमा और सुमिता हैं। मुबंई में पचास साल रहने के बाद मौजूदा समय में वे बेंगलुरू में कल्याण नगर में रह रहे हैं। कोलकत्ता से उन्होंने अपना नाता नहीं तोड़ा है। वे अब भी पूरी दुनिया में कार्यक्रम देने जाते हैं। यह पूछे जाने पर कि उन्हें किन गीतों को गा कर परम आनंद आया। बताते हैं कि ऐ भाई जरा देख के चलो गीत पर मुझे नेशनल अवार्ड मिला था पर उससे ज्यादा अच्छे गीत मैंने गाए। ऐ भाई जरा देख के चलो को तो मैं गाना ही नहीं मानता। वह तो एक्टिंग है। लागा चुनरी में दाग, कसमें वादे प्यार वफा, ओ मेरी जोहराजबीं, ये रात भीगी भीगी, झनक झनक तोरि बाजे पायलिया, पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई, कौन आया मेरे मन के द्वारे जैसे अनेक मेरे गाए गीत आज भी प्यार से सुने जाते हैं। मन्ना डे आज के हो-हल्ले वाले संगीत से दुखी हैं। आज गाने का स्तर देखकर मन खिन्न हो जाता है। आज के गाने को देखकर लगता है कि कोई भी गा सकता है।

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