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ग्रामीण स्वच्छता योजना ने पाटी सामाजिक विभाजन की खाई

वर्ष 2008 में जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने ग्रामीण स्वच्छता योजना शुरू की थी तब किसी ने इसके क्रांतिकारी प्रभाव के बारे में नहीं सोचा था। योजना के प्रभाव को देखते हुए अब राज्य सरकार ने इसे पूरे प्रदेश में लागू कर दिया है।

योजना के तहत राज्य में एक लाख से अधिक सफाई कर्मचारियों की भर्ती की गई है। हर गांव की सफाई के लिए दो सफाई कर्मचारियों को नियुक्त किया गया। ‘‘सभी जातियों के पढ़े लिखे बेरोजगार युवकों और युवतियों ने पहले सोचा था कि उन्हें बिना काम के वेतन मिलेगा। इसके लिए काफी उम्मीदवारों ने कथित तौर पर रिश्वत भी दी थी।’’

सामुदायिक विकास कार्यालय में काम करने वाले एक कर्मचारी सुभाष झा ने कहा, ‘‘अब इन लोगों को गांव और नालियों की सफाई करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अगर कोई काम नहीं करता है तो ग्राम प्रधान उसका वेतन रोक सकता है।’’

आगरा जिले के 636 गांवों में 996 सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति की गई। इसमें से 55क् ब्राrाण और ठाकुर सहित सामान्य वर्ग के हैं। इनमें एक बड़ी संख्या शहर की युवा महिलाओं की है। इन लोगों को सुबह जल्दी उठ कर गांव जाना पड़ता है।

दयालबाग इलाके के सामाजिक कार्यकर्ता प्रताप सिंह कहते हैं, ‘‘लक्ष्मीकुमारी अपने पड़ोसियों को बताती थी कि वह गांव के स्कूल में पढ़ाने जाती है। लेकिन एक दिन उसे गांव वालों के सामने झाड़ू उठाकर नाली की सफाई करनी पड़ी।’’

गांधीवादी कार्यकर्ता चंद्रवीर सिंह ने आईएएनएस को बताया, ‘‘अकोला ब्लाक के हमारे गांव में एक जाट युवक नीरज सिंह है। उसने स्कूल की शिक्षा पूरी कर ली है। अब उसे खेरिया गांव में काम पर जाना पड़ता है। गांव वाले सुनिश्चित करते हैं कि वह वास्तव में सफाई करे।’’

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